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भारत की पहली कोयला खदान बंदीकरण Aaroh Report जारी 

भारत की पहली कोयला खदान बंदीकरण Aaroh Report जारी 

Aaroh Report

संदर्भ:

हाल ही में कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) ने नई दिल्ली में देश की पहली वैज्ञानिक खदान बंदीकरण रिपोर्ट ‘आरोह’ (Aaroh Report: Annual Report on Mine Closure) जारी की. 

Aaroh Report क्या हैं?

  • परिचय: ‘आरोह’ खदान बंदीकरण पर भारत की पहली व्यापक वार्षिक रिपोर्ट है. यह पर्यावरण बहाली और बंद हो चुकी खदानों की भूमि के पुनरुपयोग (Repurposing) की सर्वोत्तम वैज्ञानिक पद्धतियों का एक राष्ट्रीय ज्ञान कोष (National Knowledge Repository) है.
  • निकाय: इस रिपोर्ट को कोयला मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले कोयला नियंत्रक संगठन (Coal Controller Organisation – CCO) द्वारा तैयार किया गया है.
  • उद्देश्य: 
    • सतत परिवर्तन (Just Transition): जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था से हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते समय स्थानीय समुदायों और पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को न्यूनतम करना.
    • पारिस्थितिकीय बहाली: खनन के कारण नष्ट हो चुके वनों, मृदा और जैव विविधता (Biodiversity) को वैज्ञानिक तरीकों से पुनर्जीवित करना.
    • संपत्ति निर्माण (Waste to Wealth): अनुपयोगी और खाली पड़ी खदानों को आर्थिक व सामाजिक रूप से उत्पादक संपत्तियों में बदलना.
  • रिपोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदु:
    • 42 खदानों का सफल बंदीकरण: रिपोर्ट में देश भर की ऐसी 42 कोयला खदानों का विवरण दिया गया है जिन्हें स्वीकृत योजनाओं के अनुसार वैज्ञानिक रूप से बंद किया गया है. इसमें से 33 खदानें पिछले एक वर्ष में ही बंद की गई हैं. 
    • ₹40,000 करोड़ का विशाल कोष: केंद्रीय कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने वैज्ञानिक खदान बंदीकरण के कार्यों के लिए ₹40,000 करोड़ से अधिक का एक समर्पित कॉपर्स (Corpus) घोषित किया है.
    • सामुदायिक विकास के लिए फंड: स्वीकृत माइन क्लोजर लागत का 25% हिस्सा (लगभग ₹10,000 करोड़) अगले एक दशक में विशेष रूप से प्रभावित खनन क्षेत्रों के सामुदायिक विकास और आजीविका सृजन के लिए आरक्षित किया गया है.
    • भविष्य का महत्वाकांक्षी लक्ष्य: मंत्रालय ने अगले दो से तीन वर्षों के भीतर अतिरिक्त 147 कोयला खदानों को समयबद्ध और वैज्ञानिक तरीके से बंद करने का लक्ष्य रखा है. 
  • नीतिगत स्तंभ:
  • रीक्लेम फ्रेमवर्क (RECLAIM Framework): यह एकीकृत खदान बंदीकरण के दौरान स्थानीय हितधारकों और सामुदायिक नेतृत्व वाली कार्यवाहियों (Community-Led Action) को सुनिश्चित करता है.
  • एल.आई.वी.ई.एस. फ्रेमवर्क (L.I.V.E.S. Framework): यह पर्यावरण स्थिरता के साथ-साथ वहां रहने वाले लोगों के लिए आजीविका (Livelihood), समावेशन और मूल्य संवर्धन पर ध्यान केंद्रित करता है. 
  • सुविकल्प टूल (SUVIKALP Tool): यह एक निर्णय-समर्थन डिजिटल प्लेटफॉर्म (Decision-support Tool) है, जो बुद्धिमानी से यह तय करने में मदद करता है कि खाली हुई खदान की जमीन का उपयोग किस काम (जैसे- कृषि, इको-टूरिज्म या सौर ऊर्जा) के लिए सबसे बेहतर रहेगा.
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग:
    • भारत-जर्मनी समझौता: वैज्ञानिक खदान बंदीकरण में वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने के लिए कोयला मंत्रालय ने जर्मनी की संस्था GIZ के साथ एक कार्यान्वयन समझौते (Implementation Agreement) पर हस्ताक्षर किए हैं. इसके तहत तकनीकी सहयोग के लिए जर्मनी और यूरोपीय संघ द्वारा वर्ष 2030 तक वित्तीय सहायता दी जाएगी.
    • ‘कोल नीर’ (Coal NEER) ब्रांड: खदानों से निकलने वाले भारी जल को रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) और अल्ट्रावायलेट तकनीकों से शुद्ध करके पीने योग्य बोतलबंद पानी में बदला जा रहा है. स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से इसकी मार्केटिंग की जा रही है.
    • झरिया पुनर्वास: झरिया कोयला क्षेत्र में रहने वाले लोगों के पुनर्वास और रोजगार के लिए हिंडालको इंडस्ट्रीज के सहयोग से विशेष तकनीकी वस्त्र पारिस्थितिकी तंत्र और कौशल केंद्र स्थापित करने के लिए त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) किया गया है.

भारत के कोयला उद्योग के लिए इसका महत्व:

  • ‘माइन ऑफ वेल्थ’ में परिवर्तन: इस पहल के माध्यम से बंद खदानों को इको-पार्क, जल संरक्षण जलाशयों, कृषि फार्मों और विवेकनगर सौर परियोजना जैसे नवीकरणीय ऊर्जा केंद्रों में बदलकर उन्हें नए आर्थिक इंजनों के रूप में विकसित किया जा सकता है.
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा (Circular Economy): खदान के पानी को ‘कोल नीर’ में बदलना और मलबे (Overburden) का उपयोग बुनियादी ढांचे के निर्माण में करना, देश में चक्रीय अर्थव्यवस्था और संसाधन दक्षता (Resource Efficiency) के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है.
  • पर्यावरणीय और जैव विविधता: अनियंत्रित रूप से छोड़ी गई पुरानी खदानें वायु और जल प्रदूषण का बड़ा कारण बनती हैं। वैज्ञानिक सुधार (Mine Rehabilitation) के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से खनन क्षेत्रों के हरित आवरण और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी.
  • नेट-जीरो लक्ष्यों की प्राप्ति: वैज्ञानिक रूप से पुनर्जीवित की गई खदानें कार्बन सिंक (Carbon Sink) के रूप में कार्य करेंगी, जिससे भारत को वर्ष 2070 तक अपने नेट-जीरो (Net-Zero) जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी. 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: ‘आरोह’ रिपोर्ट क्या है?

उत्तर: यह देश की पहली व्यापक वार्षिक रिपोर्ट (Aaroh Report) है, जो बंद हो चुकी कोयला खदानों के वैज्ञानिक सुधार, पर्यावरण बहाली और भूमि पुनरुपयोग की प्रक्रियाओं का दस्तावेजीकरण करती है.

प्रश्न 2: यह रिपोर्ट किस मंत्रालय द्वारा जारी की गई है?

उत्तर: यह ऐतिहासिक रिपोर्ट भारत सरकार के कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) के अंतर्गत कोयला नियंत्रक संगठन (CCO) द्वारा तैयार और जारी की गई है.

प्रश्न 3: कोयला खदान बंदीकरण का क्या अर्थ है?

उत्तर: जब किसी खदान से कोयला समाप्त हो जाता है, तो उसे केवल छोड़ने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से जमीन को समतल करना, वहां वृक्षारोपण करना और जल प्रबंधन करना खदान बंदीकरण (Coal Mine Closure) कहलाता है.

प्रश्न 4: इस रिपोर्ट का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: इसका उद्देश्य भारत में हरित खनन (Green Mining), वैज्ञानिक भूमि सुधार और खदान बंद होने के बाद वहां के स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका के मॉडलों को दुनिया के सामने प्रदर्शित करना है. 

प्रश्न 5: खदान बंद होने के बाद पुनर्वास कैसे किया जाएगा?

उत्तर: पुनर्वास के लिए ₹40,000 करोड़ का फंड बना है, जिसमें से 25% राशि से कौशल विकास केंद्र, ‘कोल नीर’ प्लांट और पर्यावरण अनुकूल इको-पार्क विकसित किए जाएंगे.

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