Archaeological Balirajgarh Site
संदर्भ:
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हाल ही में बिहार स्थित ऐतिहासिक बलिराजगढ़ (Balirajgarh) स्थल पर वैज्ञानिक उत्खनन का कार्य आधिकारिक रूप से शुरू कर दिया है। पुरातत्वविदों का मुख्य लक्ष्य भूमि की उस परत तक पहुँचना है जहाँ पहली बार मानव बसावट शुरू हुई थी, ताकि मिथिला सभ्यता की सटीक तिथि निर्धारित की जा सके।
बलिराजगढ़ स्थल के बारे मे:
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- स्थान: यह स्थल बिहार के मधुबनी जिले के बाबूबरही प्रखंड (Babubarhi Block) में जिला मुख्यालय से लगभग 35 किमी की दूरी पर स्थित है।
- विस्तार: यह एक विशाल प्राचीन किला (Fortification) है जो लगभग 176 एकड़ (कुछ स्रोतों में 122 एकड़) के क्षेत्र में फैला हुआ है।
- संरक्षण: वर्ष 1938 में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा ‘राष्ट्रीय महत्व का स्मारक’ घोषित किया गया था।
महत्व:
- राजा बलि की राजधानी: स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, इसे असुर राजा बलि की राजधानी माना जाता है, जो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध थे।
- प्राचीन विदेह (Mithila): कई विद्वानों और इतिहासकारों का मानना है कि यह प्राचीन विदेह साम्राज्य की राजधानी या एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र रहा होगा।
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पुरातात्विक खुदाई: इस स्थल पर अब तक पाँच चरणों (1962-2014) में खुदाई की जा चुकी है, जिससे निरंतर सांस्कृतिक विकास के प्रमाण मिले हैं:
- उत्तरी कृष्ण परिमार्जित मृदभांड (NBPW) काल: लगभग 700 ई.पू. से 200 ई.पू. (प्रारंभिक ऐतिहासिक काल)।
- शुंग काल (Sunga Period): यहाँ की विशाल ईंटों वाली किलेबंदी मुख्य रूप से इसी काल की मानी जाती है।
- कुषाण काल (Kushan Period): निरंतर व्यापार और शहरी विकास के प्रमाण।
- गुप्त काल (Gupta Period): ‘भारत के स्वर्ण युग’ से संबंधित अवशेष।
- पाल काल (Pala Period): 8वीं से 12वीं शताब्दी ईस्वी तक की बसावट।
- प्राप्त पुरावशेष:
- किलेबंदी (Fortification): पकी हुई ईंटों से बनी विशाल दीवारें, जिनकी मोटाई और बनावट उत्कृष्ट सैन्य स्थापत्य को दर्शाती है।
- मृण्मूर्तियाँ और आभूषण: टेराकोटा की पशु और मानव मूर्तियाँ, तांबे की वस्तुएं, और अर्द्ध-कीमती पत्थरों (Carnelian, Jasper) के मनके।
- सिक्के: प्राचीन ‘आहत सिक्के’ (Punch-marked coins) जो उन्नत व्यापारिक गतिविधियों के प्रतीक हैं।
