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भोजशाला परिसर

भोजशाला परिसर

bhojshala parisar

संदर्भ:

हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ (जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी) ने धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। 

  • न्यायालय ने भोजशाला परिसर को मूल रूप से वाग्देवी (मां सरस्वती) का मंदिर घोषित किया है। इसके साथ ही हिंदू पक्ष को परिसर में नियमित, निर्बाध पूजा-अर्चना का पूर्ण अधिकार प्रदान किया है।

निर्णय के मुख्य बिंदु:

  • धार्मिक चरित्र का निर्धारण: ऐतिहासिक साक्ष्यों, साहित्यिक अभिलेखों और वैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर कोर्ट ने माना कि यह संरचना राजा भोज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला और वाग्देवी का मंदिर है।
  • 2003 की व्यवस्था निरस्त: न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को खारिज कर दिया। पुरानी व्यवस्था के तहत हिंदुओं को केवल मंगलवार (पूजा) और मुसलमानों को शुक्रवार (नमाज) की अनुमति थी। अब परिसर में नमाज पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
  • वैकल्पिक भूमि का सुझाव: मुस्लिम पक्ष (मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) के दावों को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि वे चाहें तो धार जिले में ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार से वैकल्पिक भूमि की मांग कर सकते हैं।
  • ASI और प्रशासनिक नियंत्रण: यह परिसर प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अवशेष अधिनियम, 1958 (AMASR Act) के तहत एक संरक्षित स्मारक बना रहेगा। इसके समय और प्रबंधन की जिम्मेदारी ASI तथा जिला प्रशासन की होगी।
  • मूर्ति वापसी पर विचार: लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी की मूल प्रतिमा को भारत वापस लाने के संबंध में कोर्ट ने केंद्र सरकार को उचित नीतिगत कदम उठाने का सुझाव दिया है।

निर्णय का मुख्य आधार:

न्यायालय का यह निर्णय मुख्य रूप से वर्ष 2024 में 98 दिनों तक चले ASI के वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर आधारित है। 

  • पुरातात्विक साक्ष्य: 2,000 से अधिक पृष्ठों की इस रिपोर्ट में परिसर से सनातन धर्म से जुड़े कई सिक्के, शिलालेख, और भगवान गणेश, ब्रह्मा एवं नरसिंह की खंडित मूर्तियां प्राप्त हुई थीं।
  • वैज्ञानिक तकनीक: संरचना की आयु और निर्माण सामग्री की जांच के लिए कार्बन डेटिंग (Carbon Dating), पैलियोग्राफी (पुरालेखशास्त्र) और एक्स-रे फ्लोरोसेंस (XRF) स्पॉट एनालिसिस जैसी तकनीकों का प्रयोग किया गया।
  • निष्कर्ष: वर्तमान विवादित इमारत का निर्माण पूर्व-मौजूद 11वीं सदी के मंदिर के अवशेषों और खंभों का उपयोग करके किया गया था। 

कानूनी एवं संवैधानिक विश्लेषण:

पूजा स्थल अधिनियम, 1991 (Places of Worship Act)

मुस्लिम पक्ष ने इस अधिनियम की धारा 3 और 4 का हवाला दिया, जो 15 अगस्त 1947 के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने की बात करती है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम AMASR Act 1958 के तहत संरक्षित प्राचीन स्मारकों पर लागू नहीं होता

संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

यह निर्णय धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 25) और किसी समुदाय के अपनी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के अधिकार (अनुच्छेद 29) के बीच संतुलन को रेखांकित करता है।

साक्ष्य कानून (Evidence Act)

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इतिहास और पुरातत्व को एक विज्ञान माना जाना चाहिए। वैज्ञानिक साक्ष्यों (जैसे कार्बन डेटिंग) को केवल आस्था या मौखिक दावों के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर एक अत्यंत प्राचीन, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मारक है, जिसे मूल रूप से परमार राजा भोज द्वारा मां सरस्वती (वाग्देवी) के मंदिर और एक विशाल विश्वविद्यालय (महाविद्यालय) के रूप में स्थापित किया गया था।

  • स्थापना: इस ऐतिहासिक परिसर का निर्माण 1034 ईस्वी में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज (शासनकाल 1010-1064 ईस्वी) ने करवाया था। उन्होंने इसे ‘सरस्वती सदन’ के रूप में स्थापित किया, जो नालंदा और तक्षशिला की तरह दर्शन, योग, काव्य और संस्कृत शिक्षा का एक बहुत बड़ा केंद्र बना।
  • मां वाग्देवी की प्रतिमा: राजा भोज ने यहाँ ज्ञान की देवी मां सरस्वती (वाग्देवी) की एक बेहद खूबसूरत मूर्ति स्थापित की थी। वर्ष 1875 में खुदाई के दौरान यह प्रतिमा वापस मिली, जिसे 1886 में अंग्रेज मेजर किनकेट लंदन ले गए, और वर्तमान में यह ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।
  • विदेशी आक्रमण: इतिहास के अनुसार, वर्ष 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर आक्रमण कर इस शिक्षा के केंद्र को भारी क्षति पहुँचाई और इसके कुछ हिस्सों को मस्जिद में बदलने का प्रयास किया। बाद में 15वीं शताब्दी में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने मंदिर के ही अवशेषों और खंभों का उपयोग करके इसे ‘कमाल मौला मस्जिद’ का रूप दे दिया था।
  • न्यायालय का हालिया ऐतिहासिक निर्णय (मई 2026): लंबे समय से विवादित रहे इस परिसर पर 15 मई 2026 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई (ASI) की 98 दिनों की वैज्ञानिक सर्वे रिपोर्ट के आधार पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि यह स्थान मूल रूप से मां वाग्देवी का मंदिर ही था, जिसके बाद वर्ष 2003 की नमाज संबंधी पुरानी व्यवस्था को रद्द कर इसे नियमित हिंदू पूजा के लिए पूरी तरह सौंप दिया गया। [1, 3, 4]

वास्तुकला (Architecture):

  • स्तंभों का विन्यास: इस विशाल परिसर की मुख्य विशेषता इसके नक्काशीदार स्तंभ (Pillars) हैं। पूरे परिसर में 188 स्तंभ/पिलास्टर (106 मुख्य खंभे और 82 अर्ध स्तंभ) मौजूद हैं।
  • पिलर स्टैकिंग तकनीक: छत की ऊंचाई बढ़ाने के लिए खंभों को एक के ऊपर एक जोड़ने (स्टैकिंग) की विशेष प्राचीन तकनीक का उपयोग किया गया है। यह शैली दिल्ली के कुतुब परिसर और अजमेर के अढ़ाई दिन का झोंपड़ा से काफी मिलती-जुलती है।
  • सामग्री: इस पूरी दो मंजिला जैसी दिखने वाली खुली प्रांगण इमारत का निर्माण सुंदर और मजबूत बलुआ पत्थरों (Sandstone) से किया गया है।
  • बाहरी व आंतरिक बनावट: इस इमारत की बाहरी पौराणिक संरचना प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर की याद दिलाती है, जबकि इसके आंतरिक कक्षों और द्वारों की बारीक नक्काशी माउंट आबू के जैन दिलवाड़ा मंदिरों से प्रेरित लगती है। 

मुख्य विशेषताएं (Key Features):

  • धार्मिक और ऐतिहासिक नक्काशी: पत्थरों और स्तंभों पर हिंदू धर्म से जुड़े कई पवित्र प्रतीक उकेरे गए हैं। सर्वे के दौरान यहाँ कमल के फूल, घंटियां, केले के स्तंभ, श्रीफल (नारियल) युक्त कलश, और भैरव, गणेश व नरसिंह जैसी हिंदू देवी-देवताओं की खंडित कलाकृतियां मिली हैं।
  • प्राचीन शिलालेख (Inscriptions): परिसर की दीवारों और शिलाओं पर देवनागरी लिपि में संस्कृत और प्राकृत भाषा के 150 से अधिक महत्वपूर्ण शिलालेख खुदे हुए हैं। इनमें संस्कृत व्याकरण के नियम, वर्णमाला की वर्ण-नागकृपा चक्र जैसी गुप्त तांत्रिक आकृतियां और राजा अर्जुनवर्मा के काल के नाटकों के अंश (जैसे पारिजातमंजरी) लिखे हुए हैं।
  • हवन कुंड: प्रांगण के खुले आंगन के बीचों-बीच वैज्ञानिक जांच के दौरान एक प्राचीन यज्ञ कुंड (हवन कुंड) के साक्ष्य मिले हैं, जो इसके मंदिर और गुरुकुल होने का अकाट्य प्रमाण है।
  • अक्ल कुइयां: परिसर के अंदर एक प्राचीन और पवित्र कुआं स्थित है, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘अक्ल कुइयां’ (बुद्धि का कुआं) कहा जाता है, जो शिक्षा केंद्र के विद्यार्थियों के उपयोग में आता था। 

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