Bio-bitumen
संदर्भ:
हाल ही में, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) ने कृषि अवशेषों से बायो-बिटुमेन बनाने की अपनी स्वदेशी तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर अपनाने के लिए उद्योगों को हस्तांतरित किया है, जो भारत के सड़क बुनियादी ढांचे को “स्वच्छ और हरित” बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
बायो-बिटुमेन क्या हैं?
बायो-बिटुमेन, पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन (डामर) का एक टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल विकल्प है। भारत जैव-बिटुमेन का वाणिज्यिक उत्पादन करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है।
- स्रोत: यह मुख्य रूप से चावल के भूसे (पराली), मक्का, गेहूं के अवशेष और लकड़ी के लिग्निन जैसे नवीकरणीय जैविक कचरे से बनाया जाता है।
- विकास: इस तकनीक को CSIR-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (IIP), देहरादून और CSIR-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CRRI), नई दिल्ली ने संयुक्त रूप से विकसित किया है।
- प्रक्रिया: इसमें कृषि अवशेषों को ‘पायरोलिसिस’ (Pyrolysis) प्रक्रिया के माध्यम से बायो-ऑयल में बदला जाता है, जिसे बाद में सड़क निर्माण के योग्य बनाने के लिए रिफाइन और संशोधित किया जाता है।
मुख्य विशेषताएं:
- स्वदेशी नवाचार: भारत बायो-बिटुमेन का व्यावसायिक उत्पादन करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है।
- मिश्रण क्षमता: शोध के अनुसार, सड़क के प्रदर्शन से समझौता किए बिना पारंपरिक बिटुमेन का 20-30% हिस्सा बायो-बिटुमेन से बदला जा सकता है।
- फील्ड परीक्षण: मेघालय में जोराबाट-शिलांग एक्सप्रेसवे (NH-40) पर 100 मीटर के परीक्षण खंड का सफल निर्माण किया जा चुका है। इसके अलावा, नागपुर-मानसर बाईपास (NH-44) पर भी इसके उपयोग का प्रदर्शन किया गया है।
महत्व:
- आर्थिक बचत: भारत वर्तमान में अपनी बिटुमेन आवश्यकता का लगभग 50% (3.21 मिलियन टन) आयात करता है। इस तकनीक से सालाना ₹25,000–30,000 करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत होने का अनुमान है।
- प्रदूषण नियंत्रण: यह तकनीक पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को फसल अवशेषों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करती है, जिससे पराली जलाने की घटनाओं और उससे होने वाले वायु प्रदूषण में कमी आएगी।
- पर्यावरण संरक्षण: पारंपरिक बिटुमेन की तुलना में यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को 60-70% तक कम करता है।
- अपशिष्ट से धन (Waste to Wealth): यह पहल ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्यों के अनुरूप है।
