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बोमकाई बुनाई परंपरा

बोमकाई बुनाई परंपरा

Bomkai weaving tradition

 

संदर्भ:

हाल ही में ओडिशा सरकार के हथकरघा, वस्त्र और हस्तशिल्प विभाग ने गंजाम जिले में लुप्त हो रही मूल बोमकाई बुनाई परंपरा (Bomkai Weaving Tradition) को बचाने के लिए “रेवाइवल ऑफ लेंगुइशिंग प्रोडक्ट्स (कॉटन बोमकाई साड़ी)” नामक एक विशेष पुनरुद्धार अभियान शुरू किया।

बोमकाई बुनाई परंपरा के बारे में:

ओडिशा की बोमकाई बुनाई परंपरा (Bomkai Weaving Tradition) भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और वस्त्र विरासत का एक बेजोड़ उदाहरण है। मूल रूप से ओडिशा के गंजाम जिले के बोमकाई गांव से जन्मी यह कला वर्तमान में देश-विदेश में अपनी अनूठी तकनीक और जटिल डिजाइनों के लिए जानी जाती है। 

  • उत्पत्ति: बोमकाई बुनाई का इतिहास 8वीं शताब्दी (भंज राजवंश) से जुड़ा माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस कला को तत्कालीन शासकों का संरक्षण प्राप्त था। स्थानीय भाषा में ‘बोम’ का अर्थ करघा (Loom) और ‘काई’ का अर्थ हाथ (Hand) माना जाता है।
  • सोनपुर (सुवर्णपुर) में विस्तार: 1950 के दशक के बाद यह कला गंजाम से सुवर्णपुर (सोनपुर) जिले में फैली। सोनपुर के ‘भुलिया’ समुदाय के कुशल बुनकरों ने इस कला को अपनाया और इसमें रेशम (Silk) तथा नए रूपांकनों को शामिल किया। इसी कारण इसे सोनपुरी साड़ी के नाम से भी जाना जाता है।
  • धार्मिक महत्व: पारंपरिक रूप से बोमकाई साड़ियों का अत्यधिक धार्मिक महत्व रहा है। इन्हें भगवान जगन्नाथ की पारंपरिक पोशाक का हिस्सा माना जाता रहा है। 
    • ओडिसी नृत्य के दौरान देवदासी और गोटिपुआ नर्तक भी इसी परिधान को पहनते हैं। इसके अलावा, ‘सौरा’ और ‘कंध’ जनजातियों द्वारा अपनी देवी-देवताओं की मूर्तियों को ढकने के लिए विशिष्ट रंग की बोमकाई साड़ियों का उपयोग किया जाता है। 
  • बुनाई तकनीक: बोमकाई साड़ी अपनी अनूठी बनावट के लिए अन्य हथकरघा वस्त्रों से पूरी तरह भिन्न है:
  • एक्स्ट्रा वेफ्ट तकनीक (Extra Weft Technique): अधिकांश साड़ियों में जहां टाई एंड डाई (Ikat) का उपयोग होता है, वहीं बोमकाई को पूरक सूत या ‘एक्स्ट्रा वेफ्ट’ और ‘एक्स्ट्रा वार्प’ तकनीक से बिना किसी यांत्रिक कटाई के हाथों से बुना जाता है।
  • जाला तकनीक (Jala/Kapta Jala Technique): बॉर्डर और आंचल (पल्लू) के जटिल डिज़ाइनों को बनाने के लिए बिना जैकार्ड लूम के पारंपरिक ‘जाला’ मैकेनिज्म का मैन्युअल उपयोग किया जाता है। यह बेहद श्रमसाध्य (Labor-Intensive) प्रक्रिया है।
  • थ्री-शटल बुनाई (Three-Shuttle Weaving): साड़ी के किनारों को ठोस और आकर्षक रंग देने के लिए ‘थ्री-शटल’ तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘मुहोजोर्हा साड़ी’ (Muhojorha) कहा जाता है। 
  • सूत से रेशम का सफर: मूल रूप से प्राचीन काल में बोमकाई साड़ियाँ केवल मोटे सूती धागों (10s से 40s काउंट) से बनाई जाती थीं, जो स्थानीय जलवायु के अनुकूल थीं। 
    • आधुनिक समय में शहरी मांग को देखते हुए इसमें शहतूत रेशम (Mulberry Silk), टसर सिल्क और सुनहरे ज़री के धागों का व्यापक उपयोग होने लगा है।
  • गहरे और प्राथमिक रंग: बोमकाई में कंट्रास्ट रंगों का सुंदर समन्वय होता है। इसमें मुख्य रूप से गहरे लाल (Blood Red), जेट ब्लैक (Jet Black), गहरा हरा, पीला और गहरा नीला जैसे चटक रंगों का प्रयोग किया जाता है। 
    • ये रंग प्रकृति के तत्वों को दर्शाते हैं; जैसे लाल रंग जीवन का, हरा कृषि का और पीला सरसों के फूलों का प्रतीक माना जाता है। 
  • पारंपरिक मोटिफ्स: इस बुनाई में कण्ठिपुला (अतासी फूल), कड़वा करेला (Bitter Gourd), कल्पवृक्ष, कछुआ, मछली (Machli), मोर और डमरू जैसे रूपांकनों को उकेरा जाता है।
  • फोडा कुंभ (Phoda Kumbha): साड़ी के बॉर्डर पर त्रिकोणीय ज्यामितीय आकृतियाँ बनाई जाती हैं, जो मंदिर के शिखरों (Temple Spires) जैसी दिखती हैं। यह पवित्रता और सामान्य जीवन के मिलन को प्रदर्शित करता है।
  • बिंदु संरचना (Micro Dots): असली बोमकाई की पहचान इसके डिजाइनों के भीतर बने छोटे-छोटे बिंदु (Small Dots) होते हैं, जो अन्य किसी टेक्सटाइल में नहीं दिखाई देते। 
  • भौगोलिक संकेतक: भारत सरकार ने बोमकाई बुनाई की विशिष्ट भौगोलिक महत्ता और शुद्धता को बनाए रखने के लिए इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag) प्रदान किया है। 

  • यह कला भारत के भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 के तहत पंजीकृत है।

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