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हजारीबाग पुरातात्विक खोज

हजारीबाग पुरातात्विक खोज

Hazaribagh Archaeological Discovery

 

संदर्भ:

हाल ही में झारखंड के हजारीबाग जिले में मुहाने नदी घाटी के समीप 3,200 वर्ष पुरानी बहुस्तरीय (layered) मानव बस्ती के पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं, जो प्रागैतिहासिक और लौह युग से प्रारंभिक ऐतिहासिक काल तक निरंतर निवास को दर्शाते हैं।

हजारीबाग पुरातात्विक खोज संबंधी विवरण:

    • स्थान: यह ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल झारखंड के हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड के अंतर्गत मोहाने नदी बेसिन में विस्तृत है। मुख्य रूप से इसके साक्ष्य निम्नलिखित चार प्रमुख गांवों के टीलों और कृषि क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं: देहर (Daihar), सोहरा (Sohra), मंगरह (Mangarh / Manggarh) और हथिंदर (Hathinder)
      • भौगोलिक रूप से यह क्षेत्र प्राचीन ‘उत्तरापथ’ (Uttarapath) व्यापारिक गलियारे पर स्थित है, जो आगे चलकर शेरशाह सूरी और ब्रिटिश काल में ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ (GT Road) के रूप में विकसित हुआ।
      • यह स्थल प्रसिद्ध बौद्ध केंद्र बोधगया के अत्यंत निकट है, जिससे इसके एक प्रमुख ‘सैटेलाइट सेटलमेंट’ (उपकेंद्र) होने की पुष्टि होती है।
  • खोजकर्ता: स्थानीय स्तर पर इस क्षेत्र में पुरातत्व के बिखरे साक्ष्य दशकों पहले (1950 और 1990 के दशक में) ग्रामीणों और फादर टोनी हर्बर्ट जैसे विद्वानों द्वारा रेखांकित किए गए थे।
    • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पटना और रांची जोन की टीमों (पुरातत्वविद एमजी निकोस के नेतृत्व में) तथा वैश्विक विशेषज्ञों (जैसे हैमिल्टन कॉलेज न्यूयॉर्क के डॉ. अभिषेक सिंह अमर) ने हाल के वर्षों में व्यापक अध्ययन किया।
  • जमीन के नीचे दबी संरचनाओं को बिना नुकसान पहुंचाए खोजने के लिए IIT-ISM धनबाद और विश्व-भारती विश्वविद्यालय की टीमों ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (Ground Penetrating Radar – GPR) तकनीक का उपयोग किया, जिससे 100 फीट से अधिक लंबी विशाल भूमिगत संरचनाओं का पता चला। 

प्राप्त पुरावशेष:

  • उत्तरी काले चमकीले मृदभांड (NBPW – Northern Black Polished Ware): यहां से प्रचुर मात्रा में उत्कृष्ट काले रंग के पॉलिशदार मिट्टी के बर्तन मिले हैं।
  • अन्य काल के बर्तन: ताम्रपाषाण काल से लेकर मौर्य और गुप्तोत्तर काल तक के क्रमिक मिट्टी के बर्तनों के अवशेष (Habitation Layers) प्राप्त हुए है।
  • लोहा और लौह धातुमल (Iron Slag): इस स्थल से भारी मात्रा में आयरन स्लैग प्राप्त हुआ है। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यहाँ के प्राचीन निवासी उन्नत धातुकर्म और लोहे को गलाने व उपकरण बनाने की कला से भली-भांति परिचित थे। 
  • विशाल बौद्ध स्तूप: मंगरह गांव के ऊंचे टीले में 2,500 वर्ष पुराना एक विशाल बौद्ध स्तूप दफन मिला है।
  • टेराकोटा रिंग वेल्स (Ring Wells): अनुष्ठानिक और जल संचयन के उद्देश्य से बनाई गई मिट्टी की गोल वलयाकार संरचनाएं (कुएं) पाई गई हैं।
  • मूर्तियां: दाइहार और सोहरा गांवों से प्राचीन बौद्ध देवियों जैसे ‘मारीचि’ (जिन्हें ग्रामीण कमला माता मानते थे) और ‘तारा’ (जिन्हें समोखर माता के रूप में पूजा जाता था) की प्रस्तर मूर्तियां मिली हैं। 

पुरातात्विक साक्ष्यों की विशेषताएं:

  • स्तरीकृत बसावट (Layered Settlement): यह एक एकल काल की बस्ती नहीं है, बल्कि इसमें लगातार 3,200 वर्षों से लेकर ऐतिहासिक काल तक के क्रमिक सांस्कृतिक विन्यास (Debris Zones) स्पष्ट दिखाई देते हैं।
  • एनबीपीडब्ल्यू (NBPW) की विशेषता: यहां पाई गई उत्तरी काली पॉलिशदार कलाकृतियां सामान्यतः 300 ईसा पूर्व से 100 ईसा पूर्व की द्वितीय नगरीकरण की संस्कृति को दर्शाती हैं, जो इसकी उच्च आर्थिक समृद्धि का सूचक है।
  • विशिष्ट लिपि: मूर्तियों और प्रस्तर खंडों पर एक विशेष प्राचीन लिपि अंकित है, जिसके काल निर्धारण के लिए एएसआई ने लिपि विशेषज्ञों (जैसे डॉ. अर्पिता रंजन) को नियुक्त किया है।

महत्व: 

इतिहास का पुनर्लेखन

छोटानागपुर पठार और झारखंड के आदिवासी अंचल को पहले मुख्यधारा के ऐतिहासिक विमर्श से दूर माना जाता था। यह खोज सिद्ध करती है कि गंगा घाटी की समकालीन सभ्यता के समांतर यहाँ भी 3,200 वर्ष पुरानी विकसित ग्रामीण व शहरीकृत बस्तियां मौजूद थीं।

आर्थिक व व्यापारिक जुड़ाव

उत्तरापथ व्यापारिक मार्ग पर अवस्थित होने के कारण यह क्षेत्र प्राचीन भारत के अंतर-क्षेत्रीय वाणिज्य का एक जीवंत केंद्र था। लौह अयस्क की प्रचुरता और आयरन स्लैग का मिलना प्रारंभिक लौह युग (Early Iron Age) के औद्योगिक जुड़ाव को दर्शाता है।

बौद्ध धर्म का प्रसार एवं ‘बुद्ध फुट रूट’

बोधगया की निकटता और मंगरह का विशाल स्तूप यह प्रमाणित करते हैं कि यह क्षेत्र बौद्ध भिक्षुओं, तीर्थयात्रियों और व्यापारियों के आवागमन का ‘बुद्ध फुट रूट’ (Buddha foot route) था। यह झारखंड को राष्ट्रीय बौद्ध सर्किट (Buddhist Circuit) में शीर्ष स्थान प्रदान करता है।

सांस्कृतिक निरंतरता (Cultural Continuity)

जिस स्तूप और जिन बौद्ध मूर्तियों को स्थानीय ग्रामीण पीढ़ियों से ‘स्थानीय लोक देवताओं’ के रूप में पूजते आ रहे थे, वे वास्तव में प्राचीन बौद्ध विरासत हैं। यह भारत में सांस्कृतिक आत्मसातकरण (Cultural Assimilation) का अनूठा उदाहरण है।

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