भारत का चंद्रयान-3 मिशन

संदर्भ:
हाल ही में भारत के चंद्रयान-3 मिशन को अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोनॉटिक्स एंड एस्ट्रोनॉटिक्स (AIAA) द्वारा प्रतिष्ठित 2026 गोडार्ड एस्ट्रोनॉटिक्स पुरस्कार (Goddard Astronautics Award) से सम्मानित किया गया।
- चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दुर्गम दक्षिणी ध्रुव (Lunar South Pole) पर पहली बार ऐतिहासिक सॉफ्ट-लैंडिंग करने और वैश्विक अंतरिक्ष डेटा को समृद्ध करने के लिए सर्वसम्मति से चुना गया।
- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की ओर से अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने इस सर्वोच्च पुरस्कार को ग्रहण किया।
चंद्रयान-3 मिशन के बारे में:
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का चंद्रयान-3 मिशन भारत का एक ऐतिहासिक और पथप्रदर्शक अंतरिक्ष अभियान है। इसने 23 अगस्त, 2023 को चंद्रमा के दुर्गम दक्षिणी ध्रुव (Lunar South Pole) पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट-लैंडिंग कर इतिहास रचा था। इसके साथ ही भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश और चंद्रमा पर सफल लैंडिंग करने वाला चौथा देश बना।
- पृष्ठभूमि: यह मिशन जुलाई 2019 के ‘चंद्रयान-2’ का अनुवर्ती (Follow-on) चरण था। चंद्रयान-2 का लैंडर अंतिम क्षणों में क्रैश हो गया था, जिसके बाद चंद्रयान-3 को अधिक मजबूत तकनीकों के साथ डिजाइन किया गया।
- मुख्य उद्देश्य: चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित और सॉफ्ट-लैंडिंग का प्रदर्शन करना, चंद्रमा की सतह पर रोवर को चलाने की क्षमता सिद्ध करना, चंद्र मृदा और पर्यावरण पर ऑन-साइट वैज्ञानिक परीक्षण करना।
मिशन की संरचना और पेलोड:
चंद्रयान-3 का कुल वजन 3,900 किलोग्राम था और इसकी मिशन अवधि 1 चंद्र दिवस (पृथ्वी के लगभग 14 दिन) निर्धारित थी। इसमें तीन मुख्य घटक शामिल थे:
क) प्रोपल्शन मॉड्यूल (Propulsion Module – 2148 kg): इसका कार्य लैंडर मॉड्यूल को अंतरिक्ष यान के प्रक्षेपण से लेकर चंद्रमा की 100 किमी की गोलाकार कक्षा तक ले जाना था।
- SHAPE पेलोड: यह चंद्र कक्षा से पृथ्वी के स्पेक्ट्रो-पोलारिमेट्रिक हस्ताक्षरों का अध्ययन करता है ताकि रहने योग्य बाह्य-ग्रहों (Exoplanets) की खोज की जा सके। [1, 9]
ख) विक्रम लैंडर (Vikram Lander – 1752 kg): यह चंद्रमा पर सॉफ्ट-लैंडिंग के लिए उत्तरदायी मॉड्यूल था। इसमें चार वैज्ञानिक पेलोड थे:
- ChaSTE: चंद्र ध्रुवीय क्षेत्र के थर्मल और तापमान गुणों को मापने के लिए।
- ILSA: लैंडिंग साइट के आसपास भूकंपीय गतिविधि (Seismicity) को रिकॉर्ड करने के लिए।
- RAMBHA-LP: चंद्रमा की सतह के निकट प्लाज्मा (आयन और इलेक्ट्रॉन) घनत्व को मापने के लिए।
- LRA (नासा): पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की सटीक दूरी को समझने के लिए एक निष्क्रिय लेजर परावर्तक।
ग) प्रज्ञान रोवर (Pragyan Rover – 26 kg): यह 6 पहियों वाला एक रोबोटिक वाहन था, जिसने लैंडर से बाहर निकलकर चंद्र सतह का रासायनिक विश्लेषण किया।
- LIBS: लेजर-प्रेरित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोपी, जो तत्वों की पहचान करती है।
- APXS: अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर, जो चंद्र मिट्टी और चट्टानों की मौलिक संरचना निर्धारित करता है।
महत्वपूर्ण तिथियां (Timeline):
- 14 जुलाई, 2023: सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC), श्रीहरिकोटा से LVM3-M4 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3) रॉकेट द्वारा सफल प्रक्षेपण।
- 5 अगस्त, 2023: चंद्रयान-3 ने चंद्रमा की कक्षा (Lunar Orbit) में सफलतापूर्वक प्रवेश किया।
- 23 अगस्त, 2023: शाम 06:04 बजे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक टचडाउन। इस स्थल का नाम ‘शिव शक्ति बिंदु’ (Statio Shiv Shakti) रखा गया।
वैज्ञानिक निष्कर्ष और नवीनतम खोजें:
- सल्फर (S) की पुष्टि: रोवर के LIBS पेलोड ने पहली बार चंद्र सतह पर इन-सिटू (प्रत्यक्ष रूप से) सल्फर की उपस्थिति की पुष्टि की। इसके अलावा एल्युमिनियम, कैल्शियम, आयरन, क्रोमियम और टाइटेनियम जैसे तत्वों का भी पता चला।
- तापमान में अत्यधिक भिन्नता: ChaSTE पेलोड ने पाया कि चंद्र सतह का तापमान जहाँ लगभग 50-60°C था, वहीं सतह से मात्र 10 सेमी नीचे का तापमान घटकर -10°C तक पहुंच गया। यह चंद्र मिट्टी की उत्कृष्ट तापीय इन्सुलेशन क्षमता को दर्शाता है।
- उच्च-अक्षांशों पर वॉटर-आइस (Water-Ice): डेटा विश्लेषण से संकेत मिले हैं कि केवल गहरे गड्ढों (Craters) में ही नहीं, बल्कि उच्च-अक्षांशों वाले छायादार ढलानों के नीचे भी पानी की बर्फ (Water-Ice) स्थिर रूप से मौजूद हो सकती है।
- प्राचीन गड्ढे (Crater) की खोज: प्रज्ञान रोवर ने अपने मार्ग में लगभग 160 किलोमीटर चौड़े एक अत्यंत प्राचीन गड्ढे (Crater) के भूवैज्ञानिक साक्ष्य खोजे, जो चंद्रमा के प्रारंभिक विकास काल (Lunar Magma Ocean hypothesis) पर प्रकाश डालता है।
- भूकंपीय गतिविधियां: ILSA पेलोड ने चंद्रमा पर प्राकृतिक भूकंपीय कंपन (Moonquakes) और छोटे उल्कापिंडों के टकराने से उत्पन्न हलचल को रिकॉर्ड किया।
महत्व:
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मितव्ययी इंजीनियरिंग (Frugal Engineering): यह मिशन लगभग ₹615 करोड़ ($75 मिलियन) की न्यूनतम लागत में पूरा हुआ, जिसने भारत को वैश्विक कमर्शियल स्पेस मार्केट में एक प्रतिस्पर्धी शक्ति बना दिया।
- आर्टेमिस समझौता (Artemis Accords): भारत इस मिशन से ठीक पहले नासा के आर्टेमिस समझौते में शामिल हुआ था। चंद्रयान-3 का डेटा अब भविष्य के वैश्विक मानवयुक्त चंद्र मिशनों के लिए मील का पत्थर साबित हो रहा है।
- स्पेस विजन 2047: इस सफलता ने भारत के आगामी मिशनों जैसे— गगनयान (मानव अंतरिक्ष उड़ान), चंद्रयान-4 (लूनर सैंपल रिटर्न मिशन) और LUPEX (जापान के साथ संयुक्त चंद्र ध्रुवीय अन्वेषण) के लिए मार्ग प्रशस्त किया है।
गोडार्ड एस्ट्रोनॉटिक्स पुरस्कार के बारे मे:
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