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विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी विभागीय संसदीय समिति

विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी विभागीय संसदीय समिति

Departmental Parliamentary Committee on Science and Technology Environment Forest and Climate Change

संदर्भ:

हाल ही में राज्यसभा सांसद डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी को विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी विभागीय स्थायी संसदीय समिति (DRSC) का नया अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। राज्यसभा सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने राज्यसभा प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमावली के नियम 269 के तहत यह नियुक्ति 18 मई, 2026 से प्रभावी की है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी विभागीय संसदीय समिति क्या है?

विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन संबंधी समिति भारत की संसद की एक “विभागीय स्थायी संसदीय समिति” (DRSC) है। यह समिति विधायिका (संसद) द्वारा कार्यपालिका (सरकार) पर नियंत्रण और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण और तकनीकी मंच है। 

  • नियमावली: यह समिति राज्यसभा प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमावली के नियम 268 से 277 के तहत संचालित होती है।
  • प्रकृति: यह एक स्थायी (Standing) समिति है, जिसका अर्थ है कि इसका गठन प्रतिवर्ष निरंतरता के आधार पर किया जाता है।
  • सदन का नियंत्रण: भारत की 24 विभागीय समितियों में से 8 समितियाँ राज्यसभा के क्षेत्राधिकार में आती हैं, और यह समिति उन्हीं में से एक है। इसका प्रशासनिक नियंत्रण राज्यसभा सचिवालय के पास होता है। 

समिति की संरचना: 

  • कुल सदस्य: समिति में कुल 31 सदस्य होते हैं।
  • सदस्यों का अनुपात: इसमें 21 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से मनोनीत किए जाते हैं।
  • चयन प्रक्रिया: लोकसभा सदस्यों का मनोनयन लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा और राज्यसभा सदस्यों का मनोनयन राज्यसभा के सभापति (Chairman) द्वारा किया जाता है।
  • मंत्रियों का निषेध: कोई भी केंद्रीय मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता। यदि कोई सदस्य मंत्री नियुक्त हो जाता है, तो उस तिथि से समिति में उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है।
  • कार्यकाल: समिति के सदस्यों का कार्यकाल 1 वर्ष का होता है। 

प्रशासनिक क्षेत्राधिकार:

यह समिति भारत सरकार के किसी एक मंत्रालय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विज्ञान और पर्यावरण क्षेत्र से जुड़े कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों और विभागों की निगरानी करती है: 

  1. पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)
  2. विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय (इसके अंतर्गत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग (DSIR/CSIR) शामिल हैं)
  3. पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES)
  4. परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE)
  5. अंतरिक्ष विभाग (DoS) (जैसे – इसरो/ISRO) 

समिति के मुख्य कार्य:

राज्यसभा नियमावली के नियम 270 के तहत इस समिति को निम्नलिखित चार प्रमुख कार्य सौंपे गए हैं:

  • अनुदान मांगों की सूक्ष्म जाँच: बजट सत्र के दौरान जब संसद कुछ समय के लिए स्थगित होती है, तब यह समिति संबंधित मंत्रालयों की वित्तीय मांगों (Demands for Grants) का तकनीकी मूल्यांकन करती है और अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपती है।
  • विधेयकों का तकनीकी मूल्यांकन: जब संसद के किसी भी सदन द्वारा विज्ञान या पर्यावरण से जुड़ा कोई जटिल कानून (जैसे – वन संरक्षण संशोधन विधेयक या डीएनए टेक्नोलॉजी विनियमन विधेयक) इस समिति को भेजा जाता है, तो यह उस पर विस्तार से विचार करती है।
  • वार्षिक रिपोर्टों की समीक्षा: यह मंत्रालयों और उनके अधीन आने वाले स्वायत्त संस्थानों (जैसे CSIR, CPCB, भारतीय वन्यजीव संस्थान) की वार्षिक रिपोर्टों की जाँच करती है।
  • दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीतियां: राष्ट्रीय शिक्षा, पर्यावरण, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन से जुड़े दीर्घकालिक नीतिगत दस्तावेजों पर यह अपने सुझाव देती है।
  • नागरिक समाज से संवाद: यह समिति वैज्ञानिक विषयों पर जनता, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और विशेषज्ञों से सुझाव या मौखिक साक्ष्य आमंत्रित कर सकती है। 

महत्व:

  • संसद के पास समय की कमी होने के कारण यह समिति एक ‘लघु-संसद’ के रूप में काम करती है, जहाँ पर्यावरण और परमाणु ऊर्जा जैसे संवेदनशील विषयों पर विशेषज्ञता के साथ चर्चा संभव हो पाती है।
  • यह समिति भारत के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), नेट-ज़ीरो उत्सर्जन प्रतिबद्धता (2070) और अंतरिक्ष व परमाणु अनुसंधान के क्षेत्रों में विधायी स्तर पर पारदर्शिता बनाए रखने वाली सर्वोच्च संस्था है।

सीमाएं:

  1. सलाहकारी भूमिका: इस समिति की सिफारिशें पूरी तरह से सलाहकारी (Advisory) होती हैं। सरकार इसके सुझावों को मानने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है।
  2. दैनिक प्रशासन में हस्तक्षेप नहीं: यह समिति मंत्रालयों के रोजमर्रा के प्रशासनिक कार्यों की जांच नहीं कर सकती।
  3. बाध्यता का अभाव: सरकार के लिए हर वैज्ञानिक या पर्यावरणीय विधेयक को इस समिति के पास भेजना अनिवार्य नहीं है।

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