डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती
संदर्भ:
हाल ही में 6 जुलाई को भारत के महान दूरदर्शी नेता, शिक्षाविद् और प्रखर देशभक्त डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती (125th Birth Anniversary) पूरे देश में राष्ट्रीय गौरव के साथ मनाई गई।
- भारत सरकार उनके ऐतिहासिक योगदानों के सम्मान में जुलाई 2025 से जुलाई 2027 तक दो वर्ष लंबे राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में:
- प्रारंभिक जीवन: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (Dr Syama Prasad Mukherjee) का जन्म 6 जुलाई, 1901 को कलकत्ता के एक संभ्रांत परिवार में हुआ था।
- उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध शिक्षाविद् और कुलपति थे।
- शैक्षिक सुधारक (Education Reformer) के रूप में योगदान: डॉ. मुखर्जी एक असाधारण विद्वान और बैरिस्टर थे।
- वर्ष 1934 में मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति (Vice-Chancellor) बने।
- उन्होंने शिक्षा को राष्ट्रीय चेतना का माध्यम बनाया और विश्वविद्यालय में बंगाली भाषा व भारतीय संस्कृति को बढ़ावा दिया।
- राजनीतिक यात्रा: स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात की भारतीय राजनीति (Indian Politics) में एक प्रखर राष्ट्रीय नेता (National Leader) के रूप में उनकी भूमिका अद्वितीय थी:
- बंगाल विभाजन का विरोध और पश्चिम बंगाल (West Bengal) का निर्माण: 1947 में जब देश का विभाजन हो रहा था, तब डॉ. मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ा संघर्ष किया कि पूरा बंगाल पाकिस्तान में न जाए। उनके प्रयासों के कारण ही हिंदू बहुल पश्चिम बंगाल (West Bengal) भारतीय संघ का हिस्सा बना रहा।
- आधुनिक औद्योगिक नीति के प्रणेता: वे स्वतंत्र भारत की पहली कैबिनेट में उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने। उनके कार्यकाल में चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और दामोदर घाटी निगम (DVC) जैसे ऐतिहासिक सार्वजनिक उपक्रमों की नींव रखी गई, जिन्होंने भारत के औद्योगिक विकास को गति दी।
- भारतीय जनसंघ की स्थापना: नेहरू-लियाकत समझौते (1950) के विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के बाद, उन्होंने देश को एक नया राजनीतिक विकल्प देने का निर्णय लिया:
- स्थापना: अक्टूबर 1951 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सहयोग से भारतीय जनसंघ (Bharatiya Jana Sangh) की स्थापना की।
- महत्व: यह संगठन राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक गौरव और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था। यही जनसंघ आगे चलकर वर्तमान भारतीय जनता पार्टी (BJP) का वैचारिक आधार बना, जिसके कारण उन्हें प्रमुख भाजपा विचारक (BJP Ideologue) के रूप में पूजा जाता है।
- कश्मीर नीति: डॉ. मुखर्जी देश की संप्रभुता के साथ किसी भी समझौते के सख्त खिलाफ थे। उनकी कश्मीर नीति (Kashmir Policy) ने आधुनिक भारतीय इतिहास (Indian History) की दिशा बदल दी:
- एक राष्ट्र, एक विधान: वे जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और वहां लागू पृथक परमिट प्रणाली के समर्थक नही थे। उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था: “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।“
- सर्वोच्च बलिदान: मई 1953 में बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को श्रीनगर में हिरासत के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में उनका निधन हो गया, जिसे देश ‘बलिदान दिवस’ के रूप में याद करता है। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 का उन्मूलन उनके इसी राष्ट्रव्यापी विज़न को दी गई सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
- 125 फीट ऊंची प्रतिमा: इस विशेष अवसर पर भारत सरकार के गृह मंत्री द्वारा कोलकाता के इको पार्क में डॉ. मुखर्जी की 125 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का शिलान्यास किया गया है, जो देश में उनकी सबसे ऊंची प्रतिमा होगी।
- सिक्का और डाक टिकट: संस्कृति मंत्रालय द्वारा उनकी स्मृति में विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किए गए हैं।
FAQs:
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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कौन थे?
वे स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री, कलकत्ता विश्वविद्यालय के युवा कुलपति और भारतीय जनसंघ के महान राष्ट्रवादी संस्थापक थे।
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उनकी 125वीं जयंती क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत सरकार उनके राष्ट्रीय एकता, औद्योगिक नीतियों और शिक्षा सुधारों के योगदान को सम्मानित करने हेतु दो वर्षीय उत्सव मना रही है।
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भारतीय राजनीति में उनका क्या योगदान था?
उन्होंने आधुनिक औद्योगिक नीति की नींव रखी, पश्चिम बंगाल को भारत का हिस्सा बनाया और मजबूत वैचारिक विपक्ष खड़ा किया।
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भारतीय जनसंघ की स्थापना में उनकी क्या भूमिका थी?
उन्होंने 1951 में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ जनसंघ की स्थापना की, जो वर्तमान भाजपा का अग्रदूत है।
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कश्मीर मुद्दे पर उनके विचार क्या थे?
वे अनुच्छेद 370 के विरोधी थे और पूरे देश में एक संविधान, एक प्रधान तथा एक ध्वज चाहते थे।
