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एथॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम

एथॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम

Ethyl Blending Program

संदर्भ:

हाल ही में भारत ने एथॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (Ethanol Blending Programme – EBP) के तहत एथिल आपूर्ति वर्ष के पहले छह महीनों में 515 करोड़ लीटर की आपूर्ति का ऐतिहासिक आंकड़ा छुआ। उद्योग जगत ने इस वर्ष के कुल अनुबंधित 1,059 करोड़ लीटर के लक्ष्य का लगभग 49% हिस्सा सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।

भारत का एथॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम:

एथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम (EBP) एक महत्वाकांक्षी पहल है, जिसका लक्ष्य पेट्रोल में एथेनॉल (एक जैव ईंधन) को मिलाना है।

  • अर्थ: एथॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) का अर्थ है पारंपरिक जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल) में एक निश्चित अनुपात में एथॉल (एथिल अल्कोहल) को मिलाना। 
    • एथॉल एक जैविक ईंधन (Biofuel) है, जो मुख्य रूप से गन्ने के रस, शीरे, मक्का, और क्षतिग्रस्त या अधिशेष खाद्यान्नों के किण्वन (Fermentation) से प्राप्त किया जाता है। 
    • पेट्रोल में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने के कारण यह एक ‘स्वच्छ ईंधन’ की तरह कार्य करता है। 
  • पायलट चरण: इस कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत जनवरी 2003 में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा 5% सम्मिश्रण (E5) के प्रारंभिक लक्ष्य के साथ की गई थी।
  • नीतिगत गति: वर्ष 2014 के बाद इसमें तीव्र सुधार किए गए। राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति, 2018 के अंतर्गत इसके लक्ष्यों को और अधिक संस्थागत और समयबद्ध बनाया गया।
  • लक्ष्य: भारत ने मूल रूप से तय की गई 2030 की समयसीमा से पांच वर्ष पूर्व ही वर्ष 2025 में पेट्रोल में 20% एथॉल सम्मिश्रण (E20) का लक्ष्य सफलतापूर्वक हासिल कर लिया। 
    • वर्तमान में वर्ष 2026 से पूरे देश में बिकने वाले पेट्रोल में 20% सम्मिश्रण अनिवार्य कर दिया गया है। अब अगला लक्ष्य वर्ष 2030 तक E27 (27% सम्मिश्रण) तक पहुंचना है।

मुख्य उद्देश्य:

  • आयात निर्भरता कम करना: भारत की लगभग 85-88% कच्चे तेल की जरूरतों के आयात को घटाकर देश को आत्मनिर्भर बनाना।
  • विदेशी मुद्रा का संरक्षण: तेल आयात के भारी-भरकम बिल में कटौती कर मूल्यवान विदेशी मुद्रा भंडार को बचाना।
  • पर्यावरणीय प्रतिबद्धता: वाहनों से होने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन के हानिकारक उत्सर्जन को कम करके वायु गुणवत्ता सुधारना।
  • किसानों की आय में वृद्धि: कृषि अधिशेष और फसल अवशेषों के लिए एक निश्चित औद्योगिक बाजार तैयार कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना। 

संस्थागत सहयोग:

  • पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय: इस कार्यक्रम का मुख्य नोडल और नियामक मंत्रालय।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियाँ (OMCs): जैसे IOCL, BPCL, और HPCL, जो डिस्टिलरीज से एथॉल की खरीद, दीर्घकालिक समझौतों (LTOAs) और वास्तविक सम्मिश्रण का प्रबंधन करती हैं।
  • उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय: एथॉल उत्पादन के लिए भारतीय खाद्य निगम (FCI) के माध्यम से अधिशेष और टूटे हुए चावल/अनाज के आवंटन का समन्वय।
  • ऑटोमोबाइल उद्योग: इंजन और ईंधन प्रणालियों को एथॉल के अनुकूल (जैसे फ्लेक्स-फ्यूल इंजन) बनाने के लिए तकनीकी सहयोग। 

प्रमुख विशेषताएँ:

  • बहु-फीडस्टॉक प्रणाली (Multi-Feedstock): केवल गन्ने पर निर्भरता समाप्त कर मक्का, चावल और कृषि अपशिष्टों (2G एथॉल) के उपयोग की अनुमति।
  • प्रोत्साहन नीतियां: एथॉल पर जीएसटी दर को 18% से घटाकर 5% किया गया। साथ ही डिस्टिलरीज की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता (EISS) दी गई।
  • मूल्य निर्धारण तंत्र: सरकार द्वारा कच्चे माल के आधार पर एथॉल की लाभकारी कीमतें तय की जाती हैं।
  • वेस्ट-टू-वेल्थ: प्रधानमंत्री जी-वन योजना के माध्यम से पराली जैसे फसल अवशेषों से दूसरी पीढ़ी (2G) के उन्नत जैव-ईंधन उत्पादन को वित्तीय सहायता।

महत्व:

  • मैक्रो-इकॉनॉमिक स्थिरता: सम्मिश्रण के माध्यम से देश ने अब तक ₹1.6 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बचाई है, जिससे चालू खाता घाटा (CAD) नियंत्रित रहता है।
  • जलवायु परिवर्तन से मुकाबला: कार्यक्रम ने संचयी रूप से 830 लाख मीट्रिक टन से अधिक CO₂ उत्सर्जन को रोका है, जो भारत के वर्ष 2070 तक ‘नेट-जीरो’ (Net-Zero) लक्ष्य के अनुकूल है।
  • कृषि समृद्धि: किसानों और चीनी मिलों को सीधे तौर पर ₹1 लाख करोड़ से अधिक का समय पर भुगतान सुनिश्चित हुआ है, जिससे गन्ने के बकाए की समस्या हल हुई है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy): एथॉल उत्पादन के उप-उत्पाद जैसे DDGS (डिस्टिलर्स ग्रेन) का उपयोग मवेशियों के पौष्टिक चारे के रूप में हो रहा है।

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