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इरुला आदिवासी समुदाय (Irula tribal community) | Apni Pathshala

Irula tribal community

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संदर्भ:

हाल ही में इरुला आदिवासी समुदाय द्वारा मासी मघम (Masi Magam) उत्सव मनाया गया, जो उनकी सांस्कृतिक पहचान, पूर्वजों के प्रति सम्मान और सामाजिक एकजुटता का एक सशक्त प्रतीक है। 

इरुला आदिवासी समुदाय के बारे में:

    • क्षेत्र: ये मुख्य रूप से तमिलनाडु (कांचीपुरम, तिरुवल्लूर, चेंगलपट्टू) और केरल (पालक्कड़) के नीलगिरी ढलानों और मैदानी इलाकों में पाए जाते हैं।
    • वर्गीकरण: भारत सरकार द्वारा इन्हें विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) की श्रेणी में रखा गया है।
    • भाषा: ये ‘इरुला’ भाषा बोलते हैं, जो द्रविड़ परिवार की एक कन्नड़-तमिल मिश्रित बोली है।
  • पारंपरिक विशेषज्ञता:
  • सर्प पकड़ना: इरुला दुनिया भर में सांप और चूहे पकड़ने के अपने अद्वितीय कौशल के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • चिकित्सा में योगदान: ‘इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसाइटी’ (ISCICS) भारत में सांप के जहर के विरुद्ध एंटी-वेनम बनाने के लिए जहर का सबसे बड़ा स्रोत है।
  • कुल (Clan System): इनका समाज कई बहिर्विवाही कुलों (जैसे- कालकाट्टी, सोलिगा आदि) में बंटा होता हैं।
  • मुख्य देवता: ये मुख्य रूप से कन्नियम्मन (एक मातृ देवी) की पूजा करते हैं। मासी मघम इनका सबसे बड़ा वार्षिक उत्सव है।
  • भोजन: पारंपरिक रूप से ये रागी, कंदमूल और छोटे जंगली जानवरों का सेवन करते हैं।
  • बंधुआ मजदूरी: यह समुदाय लंबे समय से बंधुआ मजदूरी और भूमिहीनता जैसी समस्याओं से जूझ रहा है।
  • शिक्षा और अधिकार: वर्तमान में सरकारी योजनाओं के माध्यम से इनके शैक्षिक स्तर और भूमि अधिकारों (Forest Rights Act, 2006) में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।
मासी मघम उत्सव:

    • अवसर: तमिल महीने मासी (फरवरी-मार्च) की पूर्णिमा और मघम नक्षत्र के योग में मनाया जाता है।
    • मुख्य केंद्र: यद्यपि मासी मघम पूरे तमिलनाडु में मनाया जाता है, लेकिन इरुला समुदाय के लिए महाबलिपुरम का समुद्र तट इसका सबसे पवित्र केंद्र है।
    • खोज: समुदाय का मानना है कि उनकी संरक्षक देवी, कन्नियम्मन (Kanniammal), मार्गज़ी महीने में क्रोधित होकर समुद्र में चली गई थीं। वे उन्हें घर वापस लाने के लिए समुद्र तट पर इकट्ठा होते हैं।
    • सात बहने: वे सात कुंवारी देवियों (सप्त कन्नियों) की पूजा करते हैं, जो रेत से बनी सात सीढ़ियों के रूप में प्रतिष्ठित की जाती हैं। 

प्रमुख रस्में:

  • कूदुकई (Koodugai): उत्सव से लगभग चार दिन पहले लोग समुद्र तट पर जुटना शुरू होते हैं। इस अवधि को ‘कूदुकई’ कहा जाता है, जहाँ वे अस्थाई टेंट (पांडल) बनाकर रहते हैं।
  • पवित्र स्नान (Holy Dip): पूर्णिमा की सुबह, हजारों इरुला श्रद्धालु समुद्र में डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि यह स्नान पापों का नाश करता है और देवी की कृपा प्राप्त होती है। 
  • जीवन के संस्कार: यह दिन इरुला समुदाय के लिए सामूहिक विवाह, बच्चों के मुंडन, कान छिदवाने और नामकरण जैसे महत्वपूर्ण संस्कारों को संपन्न करने का अवसर होता है। 
  • पारंपरिक भोजन: भक्त ‘चित्रान्नम’ (विभिन्न प्रकार के चावल जैसे लेमन राइस, इमली चावल) और समुद्र से पकड़े गए केकड़ों व मछलियों का भोग लगाते हैं। 
  • कला और संगीत: उत्सव के दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों (जैसे कदीमे, थम्बट्टा) के साथ लोक नृत्य और गानों का आयोजन होता है।

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