Justice Ranjana Prakash Desai Committee

संदर्भ:
गुजरात सरकार द्वारा समान नागरिक संहिता (UCC) के कार्यान्वयन के लिए गठित न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई समिति ने हाल ही में अपनी अंतिम रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी। जिसके बाद गुजरात विधानसभा में ‘गुजरात समान नागरिक संहिता विधेयक, 2026’ पेश किया गया, जिससे गुजरात उत्तराखंड के बाद ऐसा करने वाला देश का दूसरा राज्य बनने की राह पर है।
न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई समिति:
- स्थापना: गुजरात सरकार ने फरवरी 2025 में इस उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था।
- अध्यक्षता: सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई।
- न्यायमूर्ति देसाई ने इससे पहले उत्तराखंड की UCC समिति और भारत के परिसीमन आयोग (विशेषकर जम्मू-कश्मीर के लिए) का भी नेतृत्व किया है। वर्तमान में, वे 8वें केंद्रीय वेतन आयोग की अध्यक्ष के रूप में भी नियुक्त की गई हैं।
- अन्य सदस्य: सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी सी.एल. मीणा, वरिष्ठ अधिवक्ता आर.सी. कोडेकर, डॉ. दक्षेश ठाकर और सामाजिक कार्यकर्ता गीता श्रॉफ।
- कार्यप्रणाली: समिति ने गुजरात के सभी जिलों का दौरा किया और जनता व विभिन्न हितधारकों से 19 लाख से अधिक सुझाव प्राप्त किए।
रिपोर्ट की मुख्य सिफारिशें और विधेयक के प्रावधान:
- विवाह और तलाक: सभी धर्मों के लिए एक समान विवाह नियम और अनिवार्य पंजीकरण। तलाक के लिए सभी समुदायों हेतु समान आधार (जैसे क्रूरता, व्यभिचार, परित्याग आदि) निर्धारित किए गए हैं।
- एकविवाह (Monogamy): बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध और द्विविवाह को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।
- लिव-इन रिलेशनशिप: लिव-इन जोड़ों को अपनी स्थिति का पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। पंजीकरण न कराने पर दंड का प्रावधान है। परित्यक्त महिला अपने लिव-इन पार्टनर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है।
- उत्तराधिकार और विरासत: धर्म-आधारित उत्तराधिकार कानूनों के स्थान पर एक समान उत्तराधिकार प्रणाली। संपत्ति के बंटवारे में महिलाओं (बेटियों और पत्नियों) को पुरुषों के समान अधिकार दिए गए हैं।
- बच्चों का संरक्षण: शून्य या शून्यकरणीय विवाहों और लिव-इन संबंधों से पैदा हुए बच्चों को कानूनी रूप से वैध माना जाएगा। 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की अभिरक्षा (custody) सामान्यतः माता के पास रहेगी।
- छूट: संविधान के तहत संरक्षित अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) और संविधान के भाग XXI के तहत संरक्षित समूहों के पारंपरिक अधिकारों को इस संहिता के दायरे से बाहर रखा गया है।
महत्व:
- संवैधानिक आधार: यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) को प्रभावी बनाने की दिशा में है, जो देश में एक समान नागरिक संहिता के लिए मददगार है।
- लैंगिक न्याय (Gender Justice): रिपोर्ट में महिलाओं के सशक्तिकरण और सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है, जिससे व्यक्तिगत कानूनों में मौजूद भेदभाव समाप्त होगा।
- कानूनी एकरूपता: विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) की विविधता को कम कर एक धर्मनिरपेक्ष और आधुनिक कानूनी ढांचा तैयार करना इसका मुख्य उद्देश्य है।