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लांजिया सोरा समुदाय

लांजिया सोरा समुदाय | Lanjia Sora community

Lanjia Sora community

संदर्भ:

हाल ही में ओडिशा के लांजिया सोरा (Lanjia Saora) समुदाय अपनी अनूठी दृश्य विरासत को संरक्षित करने के अपने लचीले प्रयासों के कारण चर्चा में रहा।

लांजिया सोरा समुदाय के बारे में:

  • परिचय: लांजिया सोरा ओडिशा के सबसे पुराने और विशिष्ट जनजातीय समूहों में से एक हैं। इन्हें भारत सरकार द्वारा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। 
  • निवास स्थान: ये मुख्य रूप से ओडिशा के रायगढ़ा और गजपति जिलों के पहाड़ी और वन क्षेत्रों में निवास करते हैं।
  • नामकरण: “लांजिया” नाम इनके पारंपरिक परिधान से आया है, जिसमें पुरुष पूंछ (tail) जैसी लंबी पूंछ वाला लंगोट पहनते हैं।
  • आभूषण: लांजिया सोरा महिलाएं अपने कानों में बड़े धातु के छल्ले पहनती हैं और माथे पर विशिष्ट गोदना (Tattoo) गुदवाती हैं, जो इनकी पहचान का मुख्य हिस्सा है।
  • कृषि: ये ‘पोडु चासा’ (Shifting Cultivation) और पहाड़ी ढलानों पर सीढ़ीनुमा खेती (Terrace Farming) के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • सामाजिक संरचना: इनका समाज काफी हद तक समतावादी है और इनमें ‘बिरिंडा’ (Birinda) नामक वंश आधारित संगठन होता है।
  • विरासत: इस समुदाय की सबसे महत्वपूर्ण पहचान इनकी दीवार पेंटिंग है, जिसे ‘इदिताल’ (या इकोंस/इकतोल) कहा जाता है।

  • GI टैग: हाल ही में लांजिया सोरा पेंटिंग (Idital) को भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान किया गया है, जो इसके संरक्षण और वैश्विक पहचान की दिशा में एक बड़ा कदम है।

इन पेंटिंग्स की विशेषताएं:

  • रंग और सामग्री: पारंपरिक रूप से लाल गेरू (Red Ochre) की पृष्ठभूमि पर चावल के पेस्ट (Rice Paste) से सफेद चित्र बनाए जाते हैं।
  • प्रतीक: इनमें सूर्य, चंद्रमा, ‘जीवन का वृक्ष’ (Tree of Life), हाथी, घोड़े और जनजातीय लोगों के दैनिक जीवन के दृश्यों को ज्यामितीय आकृतियों में दर्शाया जाता है。
  • कलाकार: इन्हें ‘इदिमार’ (Idaimar) कहा जाता है। पहले यह कार्य पुजारी (शमन) करते थे, लेकिन अब महिलाएं भी इस कला में निपुण हैं। 
  • धार्मिक महत्व: ये पेंटिंग्स केवल सजावट के लिए नहीं हैं, बल्कि ये अनुष्ठानिक और आध्यात्मिक महत्व रखती हैं। इन्हें घरों की मिट्टी की दीवारों पर अपने पूर्वजों और देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बनाया जाता है।
  • आधुनिकीकरण: युवा पीढ़ी अब पारंपरिक दीवारों के बजाय कैनवास और कपड़ों पर इदिताल कला बना रही है ताकि इसे व्यावसायिक रूप से बाजार में बेचा जा सके।
  • सरकारी सहायता: ओडिशा सरकार SCSTRTI के माध्यम से युवाओं को प्रशिक्षण प्रदान कर रही है ताकि इस प्राचीन कला को विलुप्त होने से बचाया जा सके।

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