स्थायी मध्यस्थता अदालत

संदर्भ:
हाल ही में भारत सरकार ने स्थायी मध्यस्थता अदालत (PCA – Permanent Court of Arbitration) के सिंधु जल संधि विवाद संबंधी फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया। भारत ने इसे “अवैध रूप से गठित” बताते हुए इसके हर निर्णय को ‘शून्य और अमान्य’ (Null and Void) घोषित किया।
स्थायी मध्यस्थता अदालत (PCA) के बारे में:
- स्थापना: स्थायी मध्यस्थता अदालत (PCA) नीदरलैंड के हेग में स्थित एक अंतर-सरकारी संगठन है। इसकी स्थापना 1899 में प्रथम हेग शांति सम्मेलन के दौरान की गई थी, जो इसे अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए समर्पित दुनिया का सबसे पुराना वैश्विक संस्थान है।
- इसकी स्थापना का मूल आधार 1899 का ‘पैसिफिक सेटलमेंट ऑफ इंटरनेशनल डिस्प्यूट्स’ कन्वेंशन था, जिसे बाद में 1907 में संशोधित किया गया।
- संरचना: PCA कोई पारंपरिक ‘स्थायी अदालत’ नहीं है, यह मध्यस्थों का एक स्थायी पैनल (सचिवालय) है। विवाद होने पर दोनों पक्ष इस पैनल से मध्यस्थों का चयन कर एक विशिष्ट ‘अदालत’ (Court of Arbitration) का गठन करते हैं। इसकी संरचना में दो मुख्य अंग हैं:
- प्रशासकीय परिषद (Administrative Council): यह सदस्य देशों के राजनयिक प्रतिनिधियों से मिलकर बनती है और इसके प्रमुख नीदरलैंड के विदेश मंत्री होते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय ब्यूरो (International Bureau): यह संस्थान के सचिवालय के रूप में कार्य करता है, जो रजिस्ट्रार और प्रशासनिक सहायता प्रदान करता है। वर्तमान में इसके पैनल में 200 से अधिक कानूनी विशेषज्ञ शामिल हैं, जिनका कार्यकाल 6 वर्ष का होता है।
- उद्देश्य: PCA का प्राथमिक उद्देश्य राज्यों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और निजी संस्थाओं के बीच उत्पन्न होने वाले कानूनी व तकनीकी विवादों का मध्यस्थता और अन्य शांतिपूर्ण माध्यमों से समाधान निकालना है।
- क्षेत्राधिकार: यह संयुक्त राष्ट्र (UN) की एजेंसी नहीं है, लेकिन इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा में स्थायी पर्यवेक्षक (Observer) का दर्जा प्राप्त है।
- इसका क्षेत्राधिकार संधियों, क्षेत्रीय और समुद्री सीमाओं (जैसे भारत-बांग्लादेश समुद्री सीमा विवाद), संप्रभुता, अंतर्राष्ट्रीय निवेश और मानवाधिकारों से जुड़े मामलों तक विस्तृत है।
- कार्यप्रणाली: जब राजनयिक वार्ता विफल हो जाती है, तब संबंधित देश इस मंच का रुख करते हैं। इसकी कार्यवाही गोपनीय या सार्वजनिक हो सकती है।
- इसके द्वारा दिए गए निर्णयों को ‘अवार्ड’ (Award) कहा जाता है। ये अवार्ड पक्षों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं, हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून में इसे जबरन लागू कराने वाली कोई केंद्रीय पुलिस शक्ति नहीं होती।
PCA पर भारत का पक्ष:
भारत ने मई 2026 में स्थायी मध्यस्थता अदालत (PCA) द्वारा ‘मैक्सिमम पोंडेज’ (अधिकतम जल संचयन सीमा) पर दिए गए फैसले को पूरी तरह खारिज करते हुए इसे ‘शून्य और अमान्य’ (Null and Void) घोषित किया है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत का रुख निम्नलिखित तीन मुख्य तर्कों पर आधारित है:
- अवैध गठन और समानांतर कार्यवाही: भारत का तर्क है कि सिंधु जल संधि (IWT) एक क्रमिक (Graded) विवाद समाधान तंत्र प्रदान करती है। जब भारत के अनुरोध पर विश्व बैंक द्वारा नियुक्त ‘तटस्थ विशेषज्ञ’ (Neutral Expert) पहले से ही किशनगंगा और रतले परियोजनाओं के तकनीकी डिजाइनों की समीक्षा कर रहे हैं, तो पाकिस्तान द्वारा समानांतर रूप से मध्यस्थता अदालत (CoA) का गठन करवाना संधि की शर्तों का सीधा उल्लंघन है। संधि एक ही समय में दो समानांतर कार्यवाहियों की अनुमति नहीं देती।
- संधि का निलंबन (Abeyance): भारत ने स्पष्ट किया है कि 2025 में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले (जिसमें 26 नागरिक मारे गए थे) के बाद भारत ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए सिंधु जल संधि को आधिकारिक तौर पर ‘स्थगित’ (Abeyance) कर दिया है। भारत का दृढ़ रुख है कि “सीमा पार आतंकवाद और जल सहयोग एक साथ नहीं चल सकते”।
- अधिकार क्षेत्र की अस्वीकार्यता: चूंकि भारत ने इस ट्रिब्यूनल को शुरू से ही ‘अवैध’ माना है, इसलिए उसने इसकी किसी भी कार्यवाही में भाग नहीं लिया। भारत किसी भी ऐसे बाहरी मंच के निर्णय को मानने के लिए बाध्य नहीं है जो संधि के मूल सिद्धांतों को दरकिनार कर एकतरफा रूप से थोपा गया हो।
सिंधु जल समझौता (IWT):
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