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केरल में पवित्र उपवनों के पुनर्जीवन हेतु प्रायोगिक कार्यक्रम

केरल में पवित्र उपवनों के पुनर्जीवन हेतु प्रायोगिक कार्यक्रम | Pilot programme for rejuvenation of sacred groves in Kerala

Pilot programme for rejuvenation of sacred groves in Kerala

संदर्भ:

हाल ही में केरल राज्य जैव विविधता बोर्ड (KSBB) ने राज्य के पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध ‘पवित्र उपवनों’ जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘कावु’ कहा जाता है, को पुनर्जीवित करने के लिए एक महत्वाकांक्षी प्रायोगिक कार्यक्रम शुरू किया।

पवित्र उपवन किसे कहते है?

पवित्र उपवन प्राकृतिक वनस्पतियों के वे क्षेत्र हैं जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा अपने देवताओं या पूर्वजों की आत्माओं को समर्पित किया जाता है। केरल में इन्हें ‘कावु’ या ‘सर्प कावु’ के नाम से जाना जाता है। 

  • यह प्राकृतिक आवास में जैव विविधता को संरक्षित करने की एक पारंपरिक विधि है।
  • यहाँ पेड़ों को काटना, शिकार करना या प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुँचाना वर्जित है।
  • यह प्राकृतिक पर्यावरण में ही जीवों और वनस्पतियों को संरक्षित करने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2002 के तहत इन्हें ‘सामुदायिक रिजर्व’ के रूप में कानूनी सुरक्षा प्रदान की जा सकती है।
  • अनुच्छेद 48A के तहत राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने का संवैधानिक निर्देश दिया गया है।

इनका महत्व:

  • जैव विविधता के केंद्र: ये उपवन दुर्लभ, स्थानिक (Endemic) और औषधीय पौधों की प्रजातियों के लिए ‘स्व-स्थाने’ (In-situ) संरक्षण स्थलों के रूप में कार्य करते हैं।
  • पारिस्थितिक सेवाएँ: ये मृदा संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और सूक्ष्म-जलवायु (Micro-climate) नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • जल संचयन: ‘कावु थिंदियाल कुलम वट्टम’ (यदि कावु अपवित्र हुआ तो तालाब सूख जाएगा) जैसी स्थानीय कहावतें इन उपवनों और जल निकायों के बीच के गहरे संबंध को दर्शाती हैं। 

प्रायोगिक कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं:

  • चयनित स्थल: प्रथम चरण में पांच विशिष्ट स्थलों को चुना गया है: एझिक्कारा (एर्नाकुलम), पट्टनचेरी (पलक्कड़), विल्लियप्पल्ली (कोझिकोड), इरित्ती (कन्नूर), उडुमा (कासरगोड)।
  • कावु नर्सरी (Kavu Nurseries): स्वदेशी और संकटग्रस्त प्रजातियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष नर्सरी स्थापित की जा रही हैं।
  • जैव-बाड़ और संरक्षण: बाहरी हस्तक्षेप रोकने के लिए देशी पौधों का उपयोग करके प्राकृतिक बाड़ (Bio-fencing) लगाई जाएगी।
  • आक्रामक प्रजातियों का निष्कासन: पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करने वाले आक्रामक पौधों और प्लास्टिक कचरे को व्यवस्थित रूप से हटाया जा रहा है।
  • प्रमुख प्रजातियों का रोपण: इस कार्यक्रम के तहत 100 से अधिक देशी प्रजातियों के लगभग 3,000 पौधे लगाने का लक्ष्य है, जिनमें Vatica chinensis, Mesua ferrea, Vateria indica, और Saraca asoca (अशोक) प्रमुख हैं।

चुनौतियाँ:

तेजी से शहरीकरण, संयुक्त परिवार प्रणाली का टूटना (जिसके कारण कावुस का संरक्षण प्रभावित हुआ है), और पारंपरिक मान्यताओं में कमी इन पारिस्थितिक क्षेत्रों के लिए बड़े खतरे हैं।

प्रयास:

  • कानूनी स्थिति: KSBB इन उपयुक्त स्थलों को जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत ‘जैव विविधता विरासत स्थल’ (Biodiversity Heritage Sites) के रूप में मान्यता दिलाने का प्रयास कर रहा है।
  • OECM दर्जा: इन उपवनों को ‘अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय’ (OECMs) के रूप में मान्यता देने की चर्चा है, जो संरक्षित क्षेत्रों के बाहर वैश्विक संरक्षण लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करते हैं।

भारत के विभिन्न राज्यों में पवित्र उपवन के स्थानीय नाम:

राज्य / क्षेत्र

स्थानीय नाम (Local Names)

कर्नाटक

देवर काडु (Devara Kadu)

तमिलनाडु

स्वामी शोला, कोविल काडु (Swami Shola / Kovil Kadu)

आंध्र प्रदेश

पवित्रवनम (Pavitravana)

महाराष्ट्र

देवराई (Devrai)

राजस्थान

ओरण, केनी, बनी, जोहड़ (Oran / Keni / Bani / Johad)

हिमाचल प्रदेश

देव वन (Deo Van)

उत्तराखंड

बुग्याल, देव भूमि (Bugyal / Deo Bhumi)

मेघालय

लॉ लिंगदोह, लॉ कियांग (Law Lyngdoh / Law Kyntang)

पश्चिम बंगाल

गरम थान, हरितान (Garam Than / Haritan)

ओडिशा

जाहिरा, ठाकुरम्मा (Jahera / Thakuramma)

झारखंड

सरना (Sarna)

छत्तीसगढ़

सरना, मट (Sarna / Mat)

मध्य प्रदेश

देव कोठार (Deo Kothar)

मणिपुर

उमांग लेई (Umang Lai)

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • सर्वाधिक संख्या: भारत में पवित्र उपवनों की सबसे अधिक संख्या हिमाचल प्रदेश में दर्ज की गई है, उसके बाद केरल का स्थान आता है।
  • मेघालय के उपवन: मेघालय के ‘लॉ लिंगदोह’ (Law Lyngdoh) पारिस्थितिक रूप से सबसे समृद्ध माने जाते हैं, जहाँ एक पत्ता भी तोड़ना वर्जित है।

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