उत्पादक मूल्य सूचकांक (Producer Price Index)

संदर्भ:
15 जून, 2026 से भारत में महंगाई मापने के ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव किया जाएगा। इसके लिए आर्थिक सलाहकार कार्यालय द्वारा पहली बार उत्पादक मूल्य सूचकांक (Producer Price Index – PPI) लॉन्च किया जाएगा।
उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) क्या हैं?
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परिचय: उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) एक ऐसा व्यापक आर्थिक संकेतक है जो घरेलू उत्पादकों द्वारा अपने उत्पादन के लिए प्राप्त की जाने वाली बिक्री कीमतों में समय के साथ होने वाले औसत मूल्य परिवर्तन को मापता है।
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यह विक्रेता या उत्पादक के दृष्टिकोण से महंगाई की गणना करता है, जो ‘फैक्ट्री-गेट’ (Factory Gate) यानी कारखाने से माल निकलते समय की कीमतों पर आधारित होता है।
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- लॉन्च तिथि: 15 जून, 2026 (मई 2026 के अनंतिम डेटा और अप्रैल 2023 से बैक-सीरीज डेटा के साथ)। लॉन्च किया जाएगा।
- नोडल मंत्रालय: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry)।
- संबद्ध कार्यालय: उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) के तहत आने वाला आर्थिक सलाहकार कार्यालय (Office of Economic Adviser)।
- आधार वर्ष (Base Year): इस नई श्रृंखला का आधार वर्ष 2022-23 निर्धारित किया गया है।
- परिवर्तनीय योजना: सरकार अगले 5 वर्षों (2031 तक) के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) और PPI दोनों को समानांतर रूप से जारी करेगी, जिसके बाद WPI को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा।
- सकल उत्पादन मूल्य (GVO) दृष्टिकोण: इसके सांख्यिकीय भारांक (Weightage Allocation) को निर्धारित करने के लिए पुराने ‘नेट ट्रेडेड वैल्यू’ के स्थान पर ग्रॉस वैल्यू ऑफ आउटपुट (Gross Value of Output) पद्धति का उपयोग किया गया है।
PPI की संरचना और प्रकार:
- आउटपुट पीपीआई (Output PPI): यह उत्पादकों द्वारा बाजार में बेचे जाने वाले अंतिम माल के लिए प्राप्त कीमतों को दर्शाता है।
- यह मूल्य (Basic Prices) पर आधारित होता है, जिसमें उत्पाद शुल्क, जीएसटी (GST) जैसे अप्रत्यक्ष कर और परिवहन मार्जिन शामिल नहीं होते। इसे मासिक जारी किया जाएगा।
- इनपुट पीपीआई (Input PPI): यह उत्पादकों द्वारा उत्पादन प्रक्रिया में उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल, ईंधन और मध्यवर्ती वस्तुओं के लिए चुकाई गई कीमतों को ट्रैक करता है।
- यह क्रेता मूल्य (Purchasers’ Prices) पर आधारित होता है, जिसमें परिवहन और व्यापार मार्जिन शामिल होते हैं। शुरुआती 2-3 वर्षों के लिए इसे केवल विनिर्माण क्षेत्र हेतु ट्रायल बेसिस पर मासिक जारी किया जाएगा।
- सेवा पीपीआई (Services PPI): देश के सेवा क्षेत्र में होने वाले मूल्य परिवर्तनों को मापने के लिए इसे त्रैमासिक (Quarterly) आधार पर जारी किया जाएगा।
प्रमुख क्षेत्र:
- वस्तुएं (Goods): प्राथमिक वस्तुएं (कृषि उत्पाद, खनिज), ईंधन व बिजली (जिसमें अब पारंपरिक ऊर्जा के साथ सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु बिजली भी शामिल हैं), और विनिर्मित उत्पाद। [1, 2]
- सेवाएं (Services): पहले चरण में 7 प्रमुख सेवा क्षेत्रों को शामिल किया गया है—
- बैंकिंग (Banking)
- प्रतिभूति लेनदेन (Securities Transactions)
- बीमा (Insurance)
- पेंशन फंड प्रबंधन (Pension Fund Management)
- रेलवे (Railways)
- विमानन (यात्री हवाई परिवहन – Air Passenger Services)
- दूरसंचार (Telecom)
महत्व:
- मुद्रास्फीति संचरण का विश्लेषण (Inflation Transmission): इनपुट और आउटपुट दोनों डेटा होने से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) यह आसानी से समझ सकता है कि कच्चे माल की बढ़ती लागत किस गति से तैयार माल तक पहुंच रही है। यह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के बढ़ने से पहले ही एक अग्रिम चेतावनी संकेतक (Early Warning Indicator) के रूप में कार्य करता है।
- सटीक जीडीपी डिफ्लेटर (Accurate GDP Deflator): राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा वास्तविक जीडीपी विकास दर की गणना के लिए प्रयुक्त होने वाला ‘जीडीपी डिफ्लेटर’ अब अधिक वास्तविक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के मानदंडों के अनुकूल होगा।
- नीति निर्माण (Policy Making): इसके माध्यम से उद्योग-विशिष्ट मुद्रास्फीति प्रवृत्तियों की सटीक समझ विकसित होगी, जिससे सरकार को अधिक लक्षित राजकोषीय नीतियां (Targeted Fiscal Policies) बनाने में मदद मिलेगी।
- व्यापारिक अनुबंध: दीर्घकालिक सरकारी और निजी व्यावसायिक आपूर्ति अनुबंधों में मूल्य समायोजन (Price Escalation Clauses) के लिए अब WPI के स्थान पर अधिक सटीक PPI का उपयोग किया जा सकेगा।