सार्क करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क | SAARC Currency Swap Framework

संदर्भ:
हाल ही में, भारत ने सार्क (SAARC) करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क के तहत मालदीव के लिए ₹30 बिलियन (₹3,000 करोड़) की मुद्रा विनिमय सुविधा को मंजूरी दी। इसके लिए भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और मालदीव मौद्रिक प्राधिकरण (MMA) के बीच समझौता हुआ है।
सार्क करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क क्या हैं?
सार्क (SAARC) करेंसी स्वैप फ्रेमवर्क एक वित्तीय तंत्र है जिसके तहत भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) सार्क सदस्य देशों के केंद्रीय बैंकों के साथ द्विपक्षीय मुद्रा विनिमय समझौते करता है।
- उद्देश्य: इसका प्राथमिक उद्देश्य सदस्य देशों को अल्पकालिक विदेशी मुद्रा तरलता प्रदान करना और भुगतान संतुलन (Balance of Payments – BoP) के संकट के समय एक वित्तीय सुरक्षा कवच उपलब्ध कराना है।
- शुरुआत: यह सुविधा पहली बार 15 नवंबर, 2012 को शुरू की गई थी।
- संचालन: इसे भारत सरकार की सहमति से RBI द्वारा संचालित किया जाता है।
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पात्र सदस्य देश: सार्क के सभी 8 सदस्य देश इस सुविधा के पात्र हैं: अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका।
- ताजा संशोधन: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में 2024 से 2027 की अवधि के लिए एक संशोधित ढांचे को मंजूरी दी है, जो पिछले 2019-22 के ढांचे का स्थान लेगा।
फ्रेमवर्क की मुख्य विशेषताएं:
- INR स्वैप विंडो (नई): भारतीय रुपये में लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए ₹25,000 करोड़ (₹250 बिलियन) का एक अलग कोष बनाया गया है। इसमें रियायती शर्तें भी शामिल हैं।
- USD/Euro स्वैप विंडो: अमेरिकी डॉलर और यूरो में सहायता के लिए $2 बिलियन का कुल कोष बरकरार रखा गया है।
- द्विपक्षीय समझौते: यह सुविधा केवल उन सार्क देशों के लिए उपलब्ध है जो RBI के साथ द्विपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर करते हैं।
रणनीतिक महत्व:
- ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति: यह भारत की अपने पड़ोसियों के प्रति प्रतिबद्धता और क्षेत्रीय नेतृत्व को दर्शाता है।
- रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण: अलग INR विंडो के माध्यम से भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये की स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास कर रहा है।
- आर्थिक एकीकरण: यह सार्क देशों के बीच आर्थिक निर्भरता और सहयोग को मजबूत करता है, जिससे पूरे क्षेत्र की विकास दर प्रभावित होती है।
- जोखिम रहित विनिमय: विनिमय की दरें पहले से निर्धारित होती हैं, जिससे बाजार में मुद्रा की अस्थिरता या विनिमय दर जोखिम का सामना नहीं करना पड़ता।
- क्षेत्रीय वित्तीय सुरक्षा: यह सार्क क्षेत्र में “अंतिम ऋणदाता” (Lender of Last Resort) की तरह कार्य करता है, जिससे बाहरी आर्थिक झटकों के समय स्थिरता बनी रहती है।
- चीन का प्रभाव: दक्षिण एशिया में बढ़ती चीनी आर्थिक उपस्थिति के बीच, भारत का यह कदम एक भरोसेमंद वैकल्पिक वित्तीय सुरक्षा जाल प्रदान करता है।