सांची स्तूप के पवित्र अवशेष

संदर्भ:
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेष पहल पर भारत सरकार द्वारा यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल सांची स्तूप से भगवान बुद्ध के दो सबसे प्रमुख शिष्यों—अर्हत सारिपुत्र और अर्हत महामौद्गल्यायन (मौद्गल्यायन)—के पवित्र अवशेषों को अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी के लिए मंगोलिया भेजा जा रहा है।
पवित्र अवशेषों का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और यात्रा वृत्तंत:
- मुख्य व्यक्तित्व: ये अस्थि-कलश भगवान बुद्ध के दाहिने और बाएं हाथ माने जाने वाले दो प्रधान शिष्यों, सारिपुत्र और मौद्गल्यायन के हैं।
- ऐतिहासिक संचयन: मूल रूप से बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद वैशाली में स्तूप बनाया गया था, जिसे बाद में सम्राट अशोक ने संरक्षित कर सांची के स्तूप संख्या-3 में स्थापित किया था।
- खोज और वापसी: वर्ष 1851 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने इन्हें खोजा था। ब्रिटेन के ‘विक्टोरिया एंड अल्बर्ट संग्रहालय’ से वर्ष 1947 में श्रीलंका होते हुए इन्हें जवाहरलाल नेहरू के प्रयासों से वापस लाया गया और सांची के चेतियगिरि विहार में प्रतिस्थापित किया गया।
- सुरक्षा और यात्रा प्रोटोकॉल: भारतीय वायु सेना (IAF) के विशेष विमान द्वारा इन अवशेषों को मंगोलिया की राजधानी उलानबटार ले जाया जा रहा है। इन्हें राजकीय अतिथि (State Guest) का दर्जा दिया गया है और इन्हें ‘स्मार्ट क्लाइमेट कंट्रोल’ व बुलेटप्रूफ बॉक्स में सख्त सुरक्षा के बीच रखा गया है। इन्हें उलानबटार के ऐतिहासिक गंडन तेगचेनलिंग मठ में सार्वजनिक दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाएगा।
सांची स्तूप के बारे में:
- स्थान: सांची स्तूप भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन जिले में स्थित एक विश्व प्रसिद्ध बौद्ध परिसर है, जो अपनी प्राचीनता, बेजोड़ वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह स्थल भोपाल से लगभग 46 किलोमीटर पूर्वोत्तर में एक पहाड़ी पर स्थित है।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: सांची के ‘महास्तूप’ (स्तूप संख्या-1) का निर्माण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में सम्राट अशोक द्वारा करवाया गया था। प्रारंभिक संरचना आकार में वर्तमान से आधी थी और केवल ईंटों से बनी थी, जिसके केंद्र में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष रखे गए थे।
- दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में शुंग राजाओं ने ईंटों के मूल स्तूप को पत्थरों से ढक दिया, जिससे इसका आकार दोगुना हो गया। इसी समय स्तूप के चारों ओर पत्थर की वेदिका (रैलिंग) का निर्माण भी किया गया।
- पहली शताब्दी ईसा पूर्व में सातवाहन शासकों ने स्तूप के चारों ओर चार अत्यंत सुंदर और अलंकृत तोरण द्वार (Gateways) जोड़े। इन द्वारों को बनाने में विदिशा के हाथीदांत के कारीगरों (Ivory Carvers) ने उत्कृष्ट नक्काशी की थी।
- पांचवीं शताब्दी ईस्वी के आसपास गुप्त काल में स्तूप के चारों प्रवेश द्वारों के सम्मुख बुद्ध की चार बैठी हुई भव्य प्रतिमाएं स्थापित की गईं।
सांची स्तूप की मुख्य विशेषताएं:
- स्थापत्य कला: सांची स्तूप प्राचीन भारतीय वास्तुकला का सबसे बेहतरीन और सुरक्षित उदाहरण है:
- मेधी (आधार): यह वह ऊँचा चबूतरा है जिस पर स्तूप का मुख्य ढांचा खड़ा होता है।
- अण्ड (Anda): यह मुख्य अर्धगोलाकार ठोस गुंबद है, जो ब्रह्मांड या स्वर्ग का प्रतीक माना जाता है।
- हर्मिका (Harmika): गुंबद के शीर्ष पर स्थित एक चौकोर बालकनी जैसी संरचना, जिसे देवताओं का निवास स्थान माना जाता है।
- यष्टि (Yashti): हर्मिका के केंद्र से निकलने वाला एक सीधा स्तंभ, जो ब्रह्मांड की धुरी (Cosmic Axis) को दर्शाता है।
- छत्रावली (Chattra): यष्टि पर स्थित तीन छतरियां (त्रि-स्तरीय छत्र), जो सम्मान, संरक्षण और बौद्ध धर्म के त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म, संघ) का प्रतीक हैं।
- प्रदक्षिणा पथ: तीर्थयात्रियों के लिए स्तूप के चारों ओर क्लॉकवाइज (घड़ी की सुई की दिशा में) परिक्रमा करने हेतु बनाया गया मार्ग।
- वेदिका (Railing): पवित्र परिसर को बाहरी दुनिया से अलग करने वाली पत्थरों की चहारदीवारी।
- नक्काशी: चारों दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) में स्थित तोरण द्वारों पर की गई बारीक नक्काशी बौद्ध कला की पराकाष्ठा है।
- इन पर जातक कथाओं (बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियां) और बुद्ध के जीवन की प्रमुख घटनाओं (जैसे महाभिनिष्क्रमण, ज्ञान प्राप्ति, प्रथम उपदेश और महापरिनिर्वाण) का सजीव चित्रण है।
- शुरुआती हीनयान परंपरा के अनुसार, यहाँ बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों (जैसे चरण चिह्न, बोधि वृक्ष, धर्मचक्र और रिक्त सिंहासन) के माध्यम से दर्शाया गया है।
- पुनखोज (1818): ब्रिटिश जनरल टेलर ने वर्ष 1818 में इस स्थल को दुर्घटनावश खोज निकाला। इसके बाद कई खजाना खोजने वालों और शौकिया पुरातत्वविदों ने इसे नुकसान पहुंचाया।
- जॉन मार्शल का योगदान: 20वीं सदी की शुरुआत में (1912-1919) पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने भोपाल की बेगमों (शाहजहाँ बेगम और सुल्तान जहाँ बेगम) से प्राप्त वित्तीय सहायता से इसका व्यापक जीर्णोद्धार कराया और 1919 में यहाँ एक संग्रहालय स्थापित किया।
- यूनेस्को विश्व धरोहर: इसकी वैश्विक सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए वर्ष 1989 में इसे यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
- अशोक स्तंभ: महास्तूप के दक्षिणी तोरण के पास सम्राट अशोक द्वारा स्थापित एकाश्म (Monolithic) स्तंभ के अवशेष हैं, जिसका सिंह शीर्ष (Lion Capital) भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के समान कलाकृति साझा करता है।
- स्तूप संख्या-2 और 3: स्तूप-2 में बौद्ध गुरुओं के अवशेष हैं, जबकि स्तूप-3 में बुद्ध के दो प्रधान शिष्यों—सारिपुत्र और महामौद्गल्यायन के पवित्र अवशेष रखे गए थे।
भारत-मंगोलिया संबंध:मंगोलिया के साथ भारत के संबंध भौगोलिक सीमाओं से परे “आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पड़ोस” (Spiritual Neighbors) पर आधारित हैं। मंगोलिया भारत को अपना ‘तीसरा पड़ोसी’ (Third Neighbour) मानता है।
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