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सम्राट संप्रति संग्रहालय

Samrat Samprati Museum

Samrat Samprati Museum

संदर्भ:

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महावीर जयंती के अवसर पर गुजरात के गांधीनगर स्थित कोबा तीर्थ में सम्राट संप्रति संग्रहालय (Samrat Samprati Museum) का उद्घाटन किया। इसे ‘ज्ञान भारतम’ मिशन के तहत एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।

सम्राट संप्रति संग्रहालय के बारे मे:

  • स्थान: श्री महावीर जैन आराधना केंद्र, कोबा, गांधीनगर (गुजरात)। 
    • कोबा तीर्थ महान जैन संत पद्मसागर सूरीश्वरजी महाराज के आशीर्वाद से स्थापित हुआ था।
  • संरचना और दीर्घाएं: संग्रहालय को 7 मुख्य विंग (Wings) में विभाजित किया गया है, जो निम्नलिखित विषयों पर केंद्रित हैं:
  • जैन दर्शन और विरासत: जैन धर्म के सिद्धांतों (अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह) का चित्रण।
  • कला और शिल्प: प्राचीन जैन प्रतिमाएं (कांस्य और पत्थर) और मंदिर वास्तुकला के नमूने।
  • पांडुलिपि दीर्घा: कोबा तीर्थ में 3 लाख से अधिक पांडुलिपियों का विशाल भंडार है। संग्रहालय इनके वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलीकरण को प्रदर्शित करता है।
  • सभ्यता का विकास: भारत की प्राचीन गौरवशाली सभ्यता और आध्यात्मिक यात्रा का प्रदर्शन।
  • कांस्य प्रतिमाएं: यहाँ 10वीं से 15वीं शताब्दी की दुर्लभ धातु की मूर्तियां संरक्षित हैं।
  • ऐतिहासिक दस्तावेज: संग्रहालय में मुगल काल के दौरान जैन मुनियों को जारी किए गए दुर्लभ ‘फरमान’ (शाही आदेश) शामिल हैं।
  • सिक्के और मुद्रा: विभिन्न राजवंशों के समय के ऐतिहासिक सिक्के जो व्यापार और संस्कृति को जोड़ते हैं।
  • ताड़-पत्र और पांडुलिपियां: ताड़ के पत्तों पर लिखे गए प्राचीन ग्रंथ जो खगोल विज्ञान, गणित और अध्यात्म पर आधारित हैं।
  • इमर्सिव एक्सपीरियंस: संग्रहालय में वर्चुअल रियलिटी (VR), इंटरैक्टिव डिस्प्ले और ऑडियो-विजुअल हॉल का उपयोग किया गया है ताकि युवा पीढ़ी इतिहास को आसानी से समझ सके।

सम्राट संप्रति का परिचय:

    • वंश: मौर्य राजवंश (Mauryan Dynasty)।
    • परिवार: वे महान सम्राट अशोक के पौत्र और कुणाल के पुत्र थे।
    • शासनकाल: लगभग 224-215 ईसा पूर्व। उन्होंने पाटलिपुत्र और उज्जैन दोनों केंद्रों से शासन किया।
    • उपाधि: संप्रति ने जैन धर्म के उत्थान के लिए कार्य किया, जिस कारण उन्हें इतिहास में ‘जैन अशोक’ के नाम से जाना जाता है।
  • धार्मिक योगदान:
    • गुरु: वे प्रसिद्ध जैन आचार्य सुहस्तिसूरी के प्रभाव में आए और जैन धर्म स्वीकार किया।
  • मंदिर निर्माण: जैन परंपराओं के अनुसार, उन्होंने पूरे भारत और विदेशों में सवा लाख (1,25,000) जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था।
  • प्रतिमा स्थापना: उन्होंने सवा करोड़ जैन मूर्तियों की स्थापना करवाई।
  • विदेशी प्रसार: उन्होंने अनार्य देशों (जहाँ जैन धर्म नहीं था) में जैन भिक्षुओं के वेश में सैनिकों को भेजकर वहां धर्म प्रचार के अनुकूल परिस्थितियां बनाईं। उन्होंने अफगानिस्तान और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों तक जैन धर्म का संदेश पहुँचाया।
  • प्रशासनिक कौशल: संप्रति एक कुशल प्रशासक थे। उन्होंने साम्राज्य की एकता बनाए रखने के लिए उज्जैन को अपनी दूसरी राजधानी बनाया ताकि दक्षिण और पश्चिम भारत पर नियंत्रण रखा जा सके।
    • उन्होंने जीव-दया (पशु संरक्षण) के लिए कई नियम बनाए और अकाल के समय जनता की सहायता के लिए अन्न भंडार खोले।
  • साहित्यिक स्रोत: ‘परिशिष्टपर्वन्’ (हेमचंद्र द्वारा रचित) और ‘कल्पसूत्र’ की टीकाओं में उनके शासन और धार्मिक कार्यों का विस्तृत वर्णन मिलता है।

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