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सैटेलाइट-टैग्ड गंगेज सॉफ्ट-शेल कछुआ

सैटेलाइट-टैग्ड गंगेज सॉफ्ट-शेल कछुआ

Satellite-tagged Ganges soft-shell turtle

संदर्भ:

हाल ही में एंडेंजर्ड स्पीशीज डे के अवसर पर असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और टाइगर रिजर्व (KNPTR) में देश का पहला सैटेलाइट-टैग्ड गंगेज सॉफ्ट-शेल कछुआ प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया।  

  • यह पहल केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के कार्यक्रम के तहत, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. अभिजीत दास के नेतृत्व में, असम वन विभाग और नेशनल जियोग्राफिक सोसाइटी के वित्तीय सहयोग से संपन्न हुई।

गंगेज सॉफ्ट-शेल कछुआ:

  • पहचान और शारीरिक संरचना: इसके सिर के ऊपरी हिस्से पर तीर के आकार (Arrowhead-shaped) के विशिष्ट निशान होते हैं। 
    • इसका ऊपरी कवच (Carapace) कठोर होने के बजाय चमड़े जैसा मुलायम और लचीला होता है। सांस लेने के लिए इसकी नाक ट्यूब या स्नॉर्कल जैसी होती है।
  • परिवार: गंगेज सॉफ्ट-शेल कछुआ (Nilssonia gangetica) मीठे पानी के कछुओं की एक विशाल प्रजाति है। वैज्ञानिक रूप से यह ट्रायओनिसिडे (Trionychidae) परिवार से संबंधित है, जिसकी मुख्य पहचान इसका चमड़े जैसा लचीला ऊपरी कवच (Carapace) है।
  • भौगोलिक वितरण: यह प्रजाति मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप की बड़ी नदियों जैसे गंगा, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और महानदी प्रणालियों, बाढ़ के मैदानों तथा बड़े मीठे पानी के आर्द्रभूमियों में पाई जाती है।
  • पारिस्थितिक भूमिका: यह एक सर्वाहारी और शीर्ष जलीय शिकारी (River Predator) है। यह नदियों में मृत और सड़ रहे जीवों के मांस (Carrion) तथा शैवाल को खाकर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को साफ रखने (Natural Scavenger) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वैधानिक और संरक्षण स्थिति:

मानक / कानून

संरक्षण श्रेणी / दर्जा

IUCN रेड लिस्ट

एंडेंजर्ड (Endangered – लुप्तप्राय)

भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972

अनुसूची-I (Schedule-I) (पूर्ण वैधानिक संरक्षण)

CITES

परिशिष्ट-I (Appendix-I) (अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध)

सैटेलाइट टैगिंग का वैज्ञानिक महत्व:

काजीरंगा के निदेशक सोनाली घोष के अनुसार, असम मीठे पानी के कछुओं की विविधता के मामले में एशिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक है, जहाँ भारत में पाई जाने वाली कछुओं की प्रजातियों में से 21 प्रजातियां अकेले असम में और 8 सॉफ्ट-शेल प्रजातियों में से 5 काजीरंगा परिदृश्य में मौजूद हैं। इस कछुए को ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तरी तट पर छोड़ा गया है। इस तकनीक के निम्नलिखित लाभ हैं:

  • मौसमी प्रवासन का अध्ययन: शोधकर्ताओं को ब्रह्मपुत्र बेसिन में कछुओं के मौसमी विस्थापन (Seasonal Movement Patterns) को सटीक रूप से समझने में मदद मिलेगी।
  • क्रिटिकल हैबिटेट्स की पहचान: कछुओं के अंडे देने (Nesting) और प्रजनन स्थलों (Breeding Sites) की सटीक मैपिंग की जा सकेगी।
  • होम रेंज ट्रैकिंग: कछुआ किस दायरे में रहता है और उसकी दैनिक गतिविधियां कैसी हैं, इसका रियल-टाइम डेटा (Home Range Data) मिलेगा।
  • सक्रिय प्रबंधन (Active Management): इस वैज्ञानिक डेटा की मदद से भविष्य में नदीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और आपदा प्रबंधन की नीतियां अधिक प्रभावी बनाई जा सकेंगी। 

मुख्य चुनौतियाँ:

  • अवैध शिकार और तस्करी: इसके मांस, पारंपरिक दवाओं के निर्माण और अंतरराष्ट्रीय पेट ट्रेड (पालतू जानवरों के अवैध बाजार) के लिए इसका बड़े पैमाने पर अवैध शिकार होता है।
  • आवास विखंडन: नदियों पर बांधों का निर्माण, गाद (Siltation) का जमा होना और कृषि भूमि का विस्तार इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहा है।
  • नदी प्रदूषण: जलीय प्रदूषण के कारण कछुओं के स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

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