Single-piece 3D-printed rocket engine
संदर्भ:
हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस (Agnikul Cosmos) ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए दुनिया के सबसे बड़े सिंगल-पीस 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन ‘अग्निते’ (Agnite) का सफल परीक्षण किया है।
अग्निकुल कॉसमॉस का सिंगल-पीस 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन
- उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य जटिल रॉकेट इंजनों के निर्माण समय और लागत को कम करना।
- इंजन का नाम: अग्निते (Agnite)।
- तकनीकी विशेषता: यह दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-पीस (एकल-खंड) 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन है, जिसकी लंबाई लगभग 1 मीटर है।
- सामग्री (Material): इसे इनकोनेल (Inconel) नामक एक उन्नत उच्च-तापमान प्रतिरोधी मिश्र धातु (High-temperature alloy) से बनाया गया है।
- विनिर्माण समय: पारंपरिक इंजनों को बनाने में महीनों लगते हैं, जबकि ‘अग्निते’ को केवल 7 दिनों में 3D-प्रिंट किया जा सकता है।
- प्रणोदन (Propulsion): यह एक सेमी-क्रायोजेनिक (Semi-cryogenic) इंजन है, जिसमें तरल ऑक्सीजन (LOX) और केरोसिन (Aviation Turbine Fuel) का उपयोग किया जाता है।
निर्माण तकनीक:
अग्निकुल को एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग (Additive Manufacturing) तकनीक के माध्यम से बनाया गया है।
- शून्य असेंबली: इसमें कोई वेल्डिंग या जॉइंट्स नहीं हैं, जिससे विफलता के बिंदु (Points of failure) कम हो जाते हैं।
- इलेक्ट्रिक मोटर पंप: यह इंजन इलेक्ट्रिक मोटर-चालित पंपों का उपयोग करने वाला अपनी श्रेणी का पहला इंजन है, जो इंजन की जटिलता को कम करता है और अधिक नियंत्रण प्रदान करता है।
- लागत और गति: यह तकनीक उत्पादन लागत को पारंपरिक तरीकों की तुलना में लगभग 1/10 तक कम कर देती है।
अग्निबाण (Agnibaan) रॉकेट के साथ संबंध:
‘अग्निते’ इंजन को अग्निबाण रॉकेट के बूस्टर चरण (Lower Stage) को शक्ति देने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- अग्निबाण एक कस्टम-निर्मित (Customizable) रॉकेट है जो 30 किग्रा से 300 किग्रा तक के पेलोड को 700 किमी की ऊँचाई वाली निचली पृथ्वी कक्षा (LEO) में ले जा सकता है।
- इससे पहले मई 2024 में, अग्निकुल ने ‘अग्निबाण SOrTeD’ (Sub-Orbital Technological Demonstrator) का सफल प्रक्षेपण किया था, जिसमें ‘अग्निलेत’ (Agnilet) इंजन का उपयोग हुआ था।
महत्व:
- त्वरित लॉन्च क्षमता: विनिर्माण समय में भारी कमी का मतलब है कि अब उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए महीनों या वर्षों का इंतजार नहीं करना होगा। यह रक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: यह परीक्षण भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) और इसरो (ISRO) के सहयोग से संपन्न हुआ, जो भारत में ‘स्पेस-टेक’ पारिस्थितिकी तंत्र के परिपक्व होने का प्रमाण है।
- स्वदेशी तकनीक: इंजन का पूरा डिजाइन और विकास स्वदेशी रूप से किया गया है, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ विजन को सशक्त बनाता है।
