Supreme Court landmark decision on Scheduled Caste status
संदर्भ:
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में यह स्पष्ट किया है कि भारत में अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और उससे जुड़े संवैधानिक लाभ केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अनुयायियों तक ही सीमित रहेंगे। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के एक पुराने आदेश को बरकरार रखते हुए यह निर्णय सुनाया।
न्यायालय का मुख्य निर्णय:
- धर्मांतरण और दर्जे की समाप्ति: न्यायालय ने व्यवस्था दी कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म (जैसे ईसाई या इस्लाम) में धर्मांतरण करता है, तो उसका SC दर्जा “तुरंत और पूरी तरह से” समाप्त हो जाएगा।
- अत्याचार निवारण अधिनियम: अदालत ने स्पष्ट किया कि धर्मांतरित व्यक्ति अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि धर्मांतरण के बाद वह इस श्रेणी का सदस्य नहीं रह जाता।
- जन्म बनाम धर्म: पीठ ने कहा कि SC पहचान केवल जन्म पर आधारित नहीं है, बल्कि यह संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत धार्मिक पहचान से भी जुड़ी है। धर्मांतरण के क्षण से ही व्यक्ति अपने पुराने दर्जे के लाभ खो देता है।
संवैधानिक और कानूनी आधार:
- अनुच्छेद 341: यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियों की सूची अधिसूचित करने का अधिकार देता है। इसी के तहत संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में स्पष्ट उल्लेख है कि हिंदू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानने वाला व्यक्ति SC नहीं माना जाएगा। 1956 में इसमें ‘सिख’ और 1990 में ‘बौद्ध’ धर्म को शामिल करने के लिए संशोधन किए गए थे।
- प्रतिबंध की प्रकृति: न्यायालय ने इस धार्मिक प्रतिबंध को “पूर्ण और गैर-परक्राम्य” (Absolute and Non-negotiable) बताया है।
- ऐतिहासिक आधार: SC आरक्षण का मूल आधार उन सामाजिक अक्षमताओं (छुआछूत) को दूर करना था जो हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था का हिस्सा थीं। ईसाई और इस्लाम जैसे ‘समतावादी’ धर्मों में सैद्धांतिक रूप से जाति व्यवस्था नहीं मानी जाती।
- मौलिक अधिकार: याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि धर्म के आधार पर आरक्षण का निर्धारण अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) का उल्लंघन है। हालांकि, न्यायालय ने 1950 के आदेश की संवैधानिक वैधता को पुनः पुष्ट किया है।
- दोहरे लाभ की चुनौती: कानूनी विशेषज्ञों ने तर्क दिया था कि दलित ईसाइयों को SC का दर्जा देने से वे ‘अल्पसंख्यक’ (अनुच्छेद 29-30) और ‘SC’ दोनों के लाभ उठाएंगे, जो एक “संवैधानिक विसंगति” होगी।
वर्तमान संदर्भ:
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार द्वारा गठित के. जी. बालकृष्णन आयोग दलित धर्मांतरितों (ईसाई और मुस्लिम) को SC दर्जा देने के जटिल मुद्दे की जांच कर रहा है।
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के.जी. बालकृष्णन आयोग (K.G. Balakrishnan Commission):
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