ऑस्ट्रेलिया लौटाएगा चोरी हुए तमिलनाडु मंदिर पुरावशेष
संदर्भ:
हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने मेलबर्न में आयोजित भारत-ऑस्ट्रिया द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के दौरान, तमिलनाडु के ऐतिहासिक मंदिरों से चोरी की गईं 11वीं-12वीं शताब्दी की बहुमूल्य प्राचीन भारतीय कलाकृतियों (Indian Antiquities) को भारत को वापस (Repatriation) सौंपने की ऐतिहासिक घोषणा की।
समझौते के तहत लौटाए जाने वाले पुरावशेष:
- कुल संख्या: इस महत्वपूर्ण समझौते (Cultural Heritage agreement) के तहत ऑस्ट्रेलिया की ‘नेशनल गैलरी ऑफ ऑस्ट्रेलिया’ (NGA) और ‘आर्ट गैलरी ऑफ न्यू साउथ वेल्स’ के संग्रह से कुल तीन प्राचीन पुरावशेष भारत वापस लाए जा रहे हैं।
- पुरावशेष और विशेषताएं:
- 1. देवी भद्रकाली का औपचारिक कांस्य त्रिशूल (Ceremonial Bronze Trident of Goddess Bhadrakali): यह उत्कृष्ट धातु शिल्प 11वीं शताब्दी (चोल काल) से संबंधित है। चोल साम्राज्य (Chola Empire) को दक्षिण भारतीय कांस्य मूर्तिकला का ‘स्वर्ण युग’ माना जाता है।
- मूल उद्गम स्थल: गहन दस्तावेजी जांच के बाद इसकी पहचान तमिलनाडु के तिरुवरूर जिले के कोल्लुमंगुडी स्थित ऐतिहासिक श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर से जुड़ी कलाकृति के रूप में हुई है।
- प्रमाणिक विशेषताएं: इस त्रिशूल के शीर्ष पर देवी भद्रकाली की सूक्ष्म धार्मिक प्रतीकात्मकता उत्कीर्ण है। यह पारंपरिक चोलकालीन मंदिर पूजा और अनुष्ठानों में उपयोग होने वाला एक पवित्र ‘औपचारिक त्रिशूल’ (Ceremonial Trident) है।
- 2. भव्य ग्रेनाइट निर्मित नंदी प्रतिमा (Majestic Granite Idol of Nandi): यह मूर्ति 11वीं से 12वीं शताब्दी के बीच निर्मित मानी गई है।
- मूल उद्गम स्थल: यह पुरावशेष भी तिरुवरूर जिले के कोल्लुमंगुडी स्थित श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर से अवैध रूप से चुराया गया था।
- प्रमाणिक विशेषताएं: ग्रेनाइट पत्थर को तराशकर बनाई गई यह नंदी (भगवान शिव के पवित्र वाहन) की प्रतिमा दक्षिण भारतीय शैव परंपरा और पाषाण कला का बेजोड़ उदाहरण है।
- 3. छह मुखों वाले भगवान कार्तिकेय की बेसाल्ट प्रतिमा (Basalt Sculpture of Six-Headed Karthikeya): यह अद्वितीय पाषाण शिल्प 12वीं शताब्दी की कला का प्रतिनिधित्व करता है।
- मूल उद्गम स्थल: इसकी उत्पत्ति तंजावुर जिले के मनाम्बडी गांव में स्थित ऐतिहासिक नागनाथस्वामी मंदिर से हुई है, जिसका निर्माण महान चोल शासक राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल के दौरान किया गया था।
- प्रमाणिक विशेषताएं: बेसाल्ट पत्थर से बनी यह मूर्ति भगवान कार्तिकेय (जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन, स्कंद या शनमुख भी कहा जाता है) को छह मुखों के साथ दर्शाती है। यह मूर्ति चोल राजवंश की परिपक्व वास्तुकला, धार्मिक समन्वय और उत्कृष्ट नक्काशी कौशल का प्रत्यक्ष साक्ष्य है।
भारत-ऑस्ट्रेलिया पुरावशेष प्रत्यर्पण समझौते:
- MLAT कानूनी ढांचा: पुरावशेषों की वापसी ‘भारत-ऑस्ट्रेलिया पारस्परिक विणीय सहायता संधि’ (Mutual Legal Assistance Treaty – MLAT) के तहत की जाती है, जो सांस्कृतिक संपदा की तस्करी के खिलाफ कानूनी सहयोग है।
- यूनेस्को कन्वेंशन 1970: यह प्रत्यर्पण ‘यूनेस्को कन्वेंशन 1970’ (सांस्कृतिक संपत्ति के अवैध आयात-निर्यात और हस्तांतरण पर रोक) के अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप है।
- घरेलू विधिक संरक्षण: भारत की तरफ से यह प्रक्रिया ‘पुरावशेष और कला खजाना अधिनियम, 1972’ के कानूनी प्रावधानों द्वारा संचालित होती है।
- ASI की भूमिका भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) नोडल एजेंसी के रूप में कलाकृतियों के ऐतिहासिक कालखंड और प्रामाणिकता की भौतिक जांच व सत्यापन करता है।
- ‘लिविंग ब्रिज’ संकल्पना: द्विपक्षीय सांस्कृतिक समझौतों के तहत 9 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों को दोनों देशों के सांस्कृतिक तालमेल का मुख्य सेतु माना गया है।
- सेंटर फॉर ऑस्ट्रेलिया-इंडिया रिलेशंस (CAIR): सिडनी में स्थापित यह उच्च-स्तरीय निकाय दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के आदान-प्रदान का प्रबंधन करता है।
- मैत्री सांस्कृतिक भागीदारी: इस विशेष साझेदारी के माध्यम से दोनों देशों की लुप्तप्राय कला प्रणालियों और पारंपरिक कला रूपों का संयुक्त प्रलेखन किया जाता है।
- पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण: दोनों देशों ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL) तक पहुंच के समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो इस प्रकार की आदान-प्रदान संभव करता है।
FAQs:
1. ऑस्ट्रेलिया भारत को कौन-कौन से पुरावशेष लौटाएगा?
ऑस्ट्रेलिया चोलकालीन कांस्य भद्रकाली त्रिशूल, ग्रेनाइट की नंदी प्रतिमा और छह मुखों वाले कार्तिकेय की बेसाल्ट मूर्ति लौटाएगा।
2. ये मंदिर पुरावशेष तमिलनाडु के किस मंदिर से जुड़े हैं?
त्रिशूल और नंदी ‘श्री काशी विश्वनाथ स्वामी मंदिर’ (तिरुवरूर) तथा कार्तिकेय मूर्ति ‘नागनाथस्वामी मंदिर’ (तंजावुर) से जुड़े है।
3. इन पुरावशेषों की वापसी कैसे संभव हुई?
यह वापसी भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच पारस्परिक कानूनी सहायता संधि (MLAT) और दोनों प्रधानमंत्रियों के बीच सफल सांस्कृतिक समझौते से हुई।
4. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की क्या भूमिका रही?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI India) ने कलाकृतियों की ऐतिहासिक प्रामाणिकता की पुष्टि करने और कानूनी दस्तावेजों को सत्यापित करने में मुख्य भूमिका निभाई।
5. सांस्कृतिक धरोहरों की तस्करी कैसे होती है?
अंतरराष्ट्रीय तस्कर गिरोह स्थानीय अपराधियों की मदद से प्राचीन मंदिरों से मूर्तियां चुराकर जाली दस्तावेज (Provenance) बनाकर विदेशों में बेचते हैं।
6. भारत पहले कितने पुरावशेष वापस ला चुका है?
विगत कुछ वर्षों में भारत वैश्विक सहयोग और कूटनीति के माध्यम से विदेशों से 250 से अधिक बहुमूल्य पुरावशेष वापस ला चुका है।
7. इन पुरावशेषों का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
ये पुरावशेष 11वीं-12वीं सदी के उत्कृष्ट चोल साम्राज्य की धातु कला, पाषाण शिल्प और दक्षिण भारतीय धार्मिक परंपरा के अनमोल प्रतीक हैं।
