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राजस्थान की थेवा कला

राजस्थान की थेवा कला

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संदर्भ:

हाल ही में भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी स्लोवाकिया यात्रा (Slovakia Visit) के दौरान स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी को राजस्थान की 400 साल पुरानी प्रसिद्ध ‘थेवा कला’ (Thewa Art) से बने विशेष कफलिंक्स (Cufflinks) उपहार स्वरूप भेंट किए।

थेवा कला (Thewa Art) के बारे में:

  • परिचय: थेवा कला (Thewa Art Rajasthan) राजस्थान की एक पारंपरिक आभूषण और सजावटी शिल्पकला है।
    • ‘थेवा’ शब्द स्थानीय भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है—‘थारना’ (जिसका अर्थ है सोने की शीट को पीटना या सेट करना) और ‘वाडा’ (यानी चांदी के फ्रेम में जड़ना)।
    • इस कला के अंतर्गत रंग-बिरंगे और विशेष रूप से उपचारित पिघले हुए कांच के ऊपर 23-कैरेट या 24-कैरेट शुद्ध सोने की सूक्ष्म, नक्काशीदार पत्तियों (Thewa Ki Patti) को वैज्ञानिक रूप से फ्यूज (समेकित) किया जाता है।
  • मंगलाचरण और आविष्कार: थेवा कला का इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना है. इस अनूठी कला का आविष्कार वर्ष 1707 में प्रतापगढ़ के एक कुशल स्वर्णकार नाथू लाल सोनी (Nathulal Soni) ने किया था. 
  • शाही संरक्षण: प्रतापगढ़ रियासत के तत्कालीन महाराजा सामंत सिंह (Maharaja Samant Singh of Pratapgarh) इस कांच-सोने की जुगलबंदी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने 1760 के दशक में सोनी परिवार को शाही संरक्षण प्रदान किया.
    • उन्होंने नाथू लाल जी को एक बड़ी जागीर (भूमि) दी और उन्हें ‘राजसोनी’ (Rajsoni – Royal Goldsmith) की प्रतिष्ठित उपाधि से नवाजा. 
  • एक गुप्त पारिवारिक परंपरा: इस कला की सबसे अनोखी बात यह है कि इसकी मूल तकनीकी प्रक्रिया को पूर्णतः गुप्त रखा जाता है. सदियों से यह शिल्प केवल ‘राजसोनी’ परिवार के पुरुषों द्वारा अपने बेटों को ही सिखाया जाता है. 
  • प्रकृति और वन्यजीव: इनमें पेड़-पौधे, बारीक बेलें, कमल के फूल, उड़ते हुए तोते, नाचते मोर, दौड़ते हिरण और राजसी हाथी प्रमुखता से उकेरे जाते हैं.
  • धार्मिक और पौराणिक कथाएं: हिंदू महाकाव्यों और पौराणिक चरित्रों जैसे भगवान कृष्ण की रासलीला, राधा-कृष्ण के प्रेम दृश्य, भगवान गणेश और श्री राम के चित्र सुंदर ढंग से बनाए जाते हैं.
  • राजसी जीवन: ऐतिहासिक शिकार के दृश्य (Shikar), शाही दरबार की बैठकें (Darbar Scenes), और भव्य विवाह बारात (Baraat Processions) इसकी मुख्य शैलियों में शामिल हैं.

तकनीक:

  • सोने की परत तैयार करना: सबसे पहले शुद्ध सोने के टुकड़ों को पीटकर एक बेहद पतली माइक्रो-शीट बनाई जाती है, जिसे ‘थेवा की पट्टी’ कहते हैं. 
  • लाख पर नक्काशी: इस सोने की पतली परत को ‘राख और राल’ (Lac-resin compound) के एक विशेष मिश्रण पर चिपकाया जाता है.
    • इसके बाद कुशल कारीगर बिना किसी आधुनिक मशीन के, केवल एक बारीक छैनी (Fine Chisel) की मदद से मुक्त हस्त से अद्भुत डिजाइनों की नक्काशी करते हैं.
  • कांच का आधार: पारंपरिक रूप से इसमें गहरे रंगों वाले बेल्जियम ग्लास (Belgian Glass) का उपयोग किया जाता है. इसके लिए मुख्य रूप से हरा (जो पन्ना जैसा दिखता है), लाल (रूबी), नीला (सफायर) और मखमली मैरून रंगों का चयन किया जाता है.
  • फ्यूजन और चांदी की डिबिया: सोने के जालीदार पैटर्न को कांच की सतह पर रखकर गर्म किया जाता है, जिससे सोना और कांच आपस में चिपक (Fuse) जाते हैं.
    • अंत में, इस उत्कृष्ट कृति को चमकदार बनाने और सुरक्षा देने के लिए इसे चांदी के बारीक फ्रेम (Chandi ki Dibiya) में मढ़ दिया जाता है. 

वैश्विक प्रसिद्धि:

  • वैश्विक संग्रहालयों की शान: प्रतापगढ़ की थेवा कला (Pratapgarh Thewa Art) केवल भारत तक सीमित नहीं है.
    • इसके बेहतरीन ऐतिहासिक उदाहरण लंदन के ‘विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम’ (Victoria & Albert Museum), न्यूयॉर्क के ‘मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम’ और लंदन के ‘जियोलॉजिकल म्यूजियम’ में सुरक्षित प्रदर्शित किए गए हैं.
  • ब्रिटेन की महारानी (Queen of England) को भी थेवा कला के आभूषण भेंट किए गए थे, जिन्होंने इसकी बारीकी की अत्यधिक प्रशंसा की थी. 

राजस्थान की संस्कृति में महत्व:

यह लोक कला (Folk Art India) राजस्थान की संस्कृति (Rajasthan Culture) और सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage India) का एक गौरवशाली प्रतीक है. 

  • भारत सरकार ने इस अनूठी स्वदेशी कला (Indigenous Craft) को संरक्षित करने के लिए इसे भौगोलिक संकेतक (GI Tag – Geographical Indication) प्रदान किया है. 
  • इसके अतिरिक्त, इसे सरकार की ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) पहल में भी शामिल किया गया है. इस कला के संरक्षण के लिए अब तक सोनी परिवार के कई दिग्गजों को पद्म श्री और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। 

FAQs:

प्रश्न 1: थेवा कला क्या है?

उत्तर: यह रंगीन बेल्जियम कांच के ऊपर शुद्ध सोने की बारीक जालीदार नक्काशी को समेकित करने वाली एक पारंपरिक कला है.

प्रश्न 2: थेवा कला की शुरुआत कहां हुई?

उत्तर: थेवा कला (Thewa Art) की शुरुआत लगभग 400 वर्ष पहले राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में हुई थी. 

प्रश्न 3: थेवा कला की प्रमुख विशेषताएं क्या हैं?

उत्तर: इसकी मुख्य विशेषता न्यूनतम सोने का उपयोग कर कांच और बारीक सोने की जुगलबंदी से राजसी चमक पैदा करना है. 

प्रश्न 4: राजस्थान की संस्कृति में इसका क्या महत्व है?

उत्तर: यह राजस्थान की हस्तशिल्प (Rajasthan Handicrafts) विरासत और राजसी गौरव को दर्शाने वाला एक अनूठा सांस्कृतिक प्रतीक है.

प्रश्न 5: थेवा कला को कैसे संरक्षित किया जा रहा है?

उत्तर: इसे जीआई टैग (GI Tag) और ODOP में शामिल कर तथा सरकारी वित्तीय प्रोत्साहन द्वारा संरक्षित किया जा रहा है.

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