संयुक्त राष्ट्र महासभा का जलवायु प्रस्ताव
संदर्भ:
हाल ही में भारत ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के जलवायु परिवर्तन संबंधी सलाहकार दृष्टिकोण पर आधारित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) प्रस्ताव पर मतदान में भाग नहीं लिया।
- प्रशांत महासागरीय द्वीप राष्ट्र वानुआतु (Vanuatu) द्वारा लाए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य जलवायु सुरक्षा पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के जुलाई 2025 के सलाहकार मत (Advisory Opinion) को मान्यता देना था। इसमें राज्यों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के कानूनी दायित्वों को याद दिलाया गया था।
- इसमें 193 सदस्यीय महासभा में 141 देशों ने पक्ष में, 8 देशों ने विरोध में (जैसे अमेरिका, रूस, सऊदी अरब) मतदान किया, जबकि 28 देश (भारत सहित) तटस्थ रहे।
भारत के मतदान से दूर रहने के प्रमुख कारण:
- UNFCCC की मूल वास्तुकला की रक्षा: भारत का मानना है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े सभी दायित्वों को संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत ही तय किया जाना चाहिए। प्रथम सचिव पेटल गहलोत के अनुसार, ICJ के गैर-बाध्यकारी गैर-न्यायिक मत को quasi-binding (अर्ध-बाध्यकारी) दर्जा देना एक गलत मिसाल स्थापित करता है।
- CBDR-RC सिद्धांत की अनदेखी: प्रस्ताव में ‘समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियां और संबंधित क्षमताएं’ (Common but Differentiated Responsibilities – CBDR) के सिद्धांत को पर्याप्त स्थान नहीं मिला। इसके तहत विकसित देशों को अपने ऐतिहासिक उत्सर्जन के कारण अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए।
- जलवायु वित्त (Climate Finance) का गायब होना: इस प्रस्ताव के पाठ (Text) में ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ शब्द का उल्लेख न होना भारत के लिए सबसे बड़ी निराशा थी। विकासशील देशों को तकनीक हस्तांतरण और वित्तीय सहायता के बिना कड़े नियमों में बांधना ‘इंसाफ’ के विरुद्ध है।
- राष्ट्रीय नीतिगत स्वतंत्रता (Policy Space) पर संकट: प्रस्ताव में बाहरी बेंचमार्क और शमन मार्ग (Mitigation pathways) निर्धारित किए गए थे। इससे भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) अंतरराष्ट्रीय न्यायिक जांच के दायरे में आ सकते थे, जो पेरिस समझौते के ‘बॉटम-अप’ दृष्टिकोण के खिलाफ है।
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संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) संयुक्त राष्ट्र का मुख्य नीति-निर्माता, विचार-विमर्श करने वाला और सबसे प्रतिनिधि अंग है।
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