अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन | Underground Coal Gasification

संदर्भ:
हाल ही में कोयला मंत्रालय ने देश में पहली बार अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (Underground Coal Gasification – UCG) प्रावधानों वाले कोल माइने डेवलपमेंट एंड प्रोडक्शन एग्रीमेंट (CMDPAs) पर हस्ताक्षर किए हैं। 14वें दौर की कमर्शियल कोयला नीलामी के तहत चार कोयला खदानों के लिए ये समझौते किए गए हैं:
- रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Reliance Industries Ltd): आंध्र प्रदेश में स्थित रेचर्ला (Recherla) और चिन्तलपुडी सेक्टर A1 (Chintalpudi Sector A1) खदानें।
- एक्सिस एनर्जी वेंचर्स (Axis Energy Ventures India Pvt Ltd): ओडिशा में स्थित डिप एक्सटेंशन ऑफ बेलपहार (Dip Extension of Belpahar) और टांगरडीही ईस्ट (Tangardihi East) कोयला खदानें।
अंडरग्राउंड कोल गैसीफिकेशन (UCG) क्या है?
- परिचय: UCG एक उन्नत इन-सिटू (In-situ) प्रक्रिया है जिसमें कोयले को जमीन से बाहर निकाले बिना ही उसे गैसीय अवस्था (सिंथेटिक गैस या सिनगैस) में बदल दिया जाता है।
- प्रक्रिया: जमीन में कुएं खोदकर ऑक्सीजन और भाप (steam) इंजेक्ट की जाती है, जिससे कोयला जलकर सिनगैस (Syngas) बनाता है। इस गैस को दूसरे कुएं के माध्यम से सतह पर लाया जाता है।
- घटक: सिनगैस मुख्य रूप से हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड का मिश्रण होती है।
महत्व:
- अगम्य भंडार का दोहन: यह तकनीक उन कोयला परतों (seams) से ऊर्जा निकालने में सक्षम है जो बहुत गहरी या पतली हैं और पारंपरिक खनन के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं थीं।
- आयात पर निर्भरता में कमी: सिनगैस का उपयोग यूरिया, अमोनिया, मेथनॉल और सिंथेटिक ईंधन बनाने के लिए किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक गैस और उर्वरकों के महंगे आयात में भारी कमी आएगी।
- स्वच्छ ऊर्जा पथ: पारंपरिक ओपन-कास्ट माइनिंग की तुलना में UCG में सतह पर कम व्यवधान होता है और यह ‘क्लीन कोल टेक्नोलॉजी’ का हिस्सा है।
- आर्थिक आंकड़े: अब तक कुल 138 कमर्शियल खदानों के समझौते हो चुके हैं, जिनसे ₹42,980 करोड़ का वार्षिक राजस्व और ₹48,231 करोड़ के निवेश की उम्मीद है।
पर्यावरणीय चिंताएं:
- भूजल संदूषण: जमीन के नीचे गैसीफिकेशन के दौरान पैदा होने वाले फिनोल और बेंजीन जैसे रसायन पास के जल स्रोतों को प्रदूषित कर सकते हैं।
- जमीन का धंसना (Subsidence): कोयले के जलने से बने रिक्त स्थान के कारण जमीन धंसने का खतरा बना रहता है।
- तकनीकी जटिलता: भारत में उच्च राख (ash) वाले कोयले के लिए इस तकनीक का सफल संचालन अभी भी परीक्षण के दौर में है।
सरकारी नीति और दिशा-निर्देश:
- अनिवार्य अध्ययन: किसी भी परियोजना से पहले मान्यता प्राप्त संस्थान द्वारा ‘पायलट फिजिबिलिटी स्टडी’ अनिवार्य है।
- गहराई सीमा: पर्यावरण सुरक्षा के लिए गैसीफिकेशन केवल 300 मीटर से अधिक गहराई वाली परतों में ही अनुमत है।
- माइन क्लोजर फंड: ऑपरेटरों को एक एस्क्रो खाते में प्रति हेक्टेयर ₹50,000 की दर से सुरक्षा राशि जमा करनी होगी।