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राजा रवि वर्मा

Raja Ravi Verma

Raja Ravi Verma

संदर्भ:

राजा रवि वर्मा की पेंटिंग ‘यशोदा और कृष्ण’ नीलामी में बिकने वाली आधुनिक भारतीय कला की अब तक की सबसे महंगी कृति बन गई है, जिसने रिकॉर्ड तोड़ ₹167.2 करोड़ की कीमत हासिल की है।

  • पिछला रिकॉर्ड: एम.एफ. हुसैन की कृति ‘अनटाइटल्ड (ग्राम यात्रा)’ (लगभग ₹118-119 करोड़)।
  • क्रेता: प्रसिद्ध उद्योगपति और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक डॉ. साइरस पूनावाला

‘यशोदा और कृष्ण’ पेंटिग के बारे मे:

  • दृश्य: यह पेंटिंग वात्सल्य रस का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें माता यशोदा को गाय दुहते हुए दिखाया गया है, जबकि बालक कृष्ण पीछे से दूध के पात्र की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं। 
  • शैली: इसमें ‘यूरोपीय यथार्थवाद’ (European Realism) और ‘भारतीय संवेदना’ का अद्भुत मेल है।
  • तकनीक: इसमें ‘चियारोस्क्यूरो’ (Chiaroscuro) तकनीक का प्रयोग किया है, जिसमें प्रकाश और छाया के माध्यम से नाटकीय प्रभाव पैदा किया जाता है।
  • विषय: लोगों ने इसकी तुलना पश्चिम की ‘मैडोना और चाइल्ड’ छवियों से की है, जो सार्वभौमिक मातृत्व को दर्शाती हैं। 
  • विशेषता: यह एक ‘नेशनल ट्रेजर’ (राष्ट्रीय धरोहर) है, जिसे भारत से बाहर नहीं ले जाया जा सकता।

राजा रवि वर्मा कौन थे?

राजा रवि वर्मा (1848–1906) एक विश्वविख्यात भारतीय चित्रकार थे, जिन्हें ‘आधुनिक भारतीय कला का जनक’ माना जाता है। उन्होंने पश्चिमी ‘अकादमिक यथार्थवाद’ और भारतीय पौराणिक विषयों का जो अनूठा संगम प्रस्तुत किया, उसने भारतीय कला के इतिहास को सदैव के लिए बदल दिया। 

  • जन्म: उनका जन्म 29 अप्रैल 1848 को तत्कालीन त्रावणकोर रियासत (वर्तमान केरल) के किलीमानूर महल में एक कुलीन परिवार में हुआ था।
  • कला के प्रति झुकाव: बचपन से ही वे दीवारों पर कोयले से चित्र बनाया करते थे। उनके चाचा, राज राजा वर्मा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें कला की प्रारंभिक शिक्षा दी।
  • राजकीय संरक्षण: 14 वर्ष की आयु में उन्हें त्रावणकोर के महाराजा आयल्यम थिरुनल का संरक्षण प्राप्त हुआ, जहाँ उन्होंने शाही चित्रकारों से जलरंग की बारीकियां सीखीं। 

उनकी कलात्मक शैली और तकनीक:

  • तैल चित्रकला: राजा रवि वर्मा पहले भारतीय कलाकारों में से थे जिन्होंने तैल चित्रकला (Oil Painting) और पश्चिमी तकनीकों का सफलतापूर्वक उपयोग किया। 
  • यूरोपीय-भारतीय संगम: उन्होंने यूरोपीय कलाकारों (जैसे थियोडोर जेनसन) से ‘चियारोस्क्यूरो’ (प्रकाश और छाया का खेल) और ‘पर्सपेक्टिव’ (दृष्टिकोण) जैसी तकनीकें सीखीं और उन्हें रामायण, महाभारत और पुराणों के दृश्यों पर लागू किया।
  • मानवीय स्वरूप: उन्होंने देवी-देवताओं को अलौकिक के बजाय मानवरूपी गरिमा के साथ चित्रित किया, जिससे आम जनता उनसे जुड़ाव महसूस कर सकी। 

लिथोग्राफिक प्रेस:

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि 1894 में मुंबई (घाटकोपर/गिरगाँव) में ‘रवि वर्मा लिथोग्राफिक प्रेस’ की स्थापना थी। 

  • ओलेोग्राफ्स (Oleographs): इस प्रेस के माध्यम से उन्होंने अपने चित्रों के सस्ते रंगीन प्रिंट (ओलेोग्राफ्स) तैयार किए।
  • सामाजिक प्रभाव: इससे कला महलों से निकलकर आम आदमी के घरों और पूजा घरों तक पहुँची। विशेष रूप से, यह उन दलितों और वंचित वर्गों के लिए वरदान साबित हुआ जिन्हें मंदिरों में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। 

प्रमुख कृतियाँ और सम्मान:

  • प्रसिद्ध चित्र: ‘दमयंती और हंस’, ‘शकुंतला का दुष्यंत के नाम प्रेम-पत्र’, ‘जटायु वध’, ‘नायर महिला’ और हाल ही में ₹167.2 करोड़ में बिकी ‘यशोदा और कृष्ण’।
  • पुरस्कार:
    • 1873 में वियना कला प्रदर्शनी में प्रथम पुरस्कार।
    • 1893 में शिकागो के ‘वर्ल्ड्स कोलंबियन एक्सपोजिशन’ में तीन स्वर्ण पदक।
    • 1904 में ब्रिटिश सरकार द्वारा ‘कैसर-ए-हिंद’ (Kaisar-i-Hind) स्वर्ण पदक से सम्मानित।
    • खगोलीय सम्मान: 2013 में बुध (Mercury) ग्रह पर एक क्रेटर का नाम उनके सम्मान में ‘वर्मा’ रखा गया।

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