Blackbuck
संदर्भ:
हाल ही कृष्णमृग (Blackbuck) को लगभग 50 वर्षों के अंतराल के बाद, छत्तीसगढ़ के घास के मैदानों में फिर से दौड़ता देखा गया। छत्तीसगढ़ में इसे 2017 में स्थानीय रूप से विलुप्त (Locally Extinct) घोषित किया गया था, हालांकि 1970 के दशक से ही इसकी संख्या नगण्य हो गई थी।
कृष्णमृग के बारे मे:
- वैज्ञानिक नाम: Antilope cervicapra।
- पहचान: नर के पास 35-75 सेमी लंबे सर्पिल (ग़ुमावदार) सींग होते हैं, जबकि मादाएं आमतौर पर सींग रहित होती हैं।
- रंग: वयस्क नर का शरीर गहरा भूरा या काला होता है, जबकि मादाएं और बच्चे हल्के भूरे (fawn) रंग के होते हैं।
- गति: यह भारत का सबसे तेज दौड़ने वाला स्थलीय स्तनधारी है, जो 80 किमी/घंटा की रफ्तार पकड़ सकता है।
- प्राकृतिक आवास: ये खुले घास के मैदानों (grasslands), शुष्क कांटेदार झाड़ियों और कम घने जंगलों में रहना पसंद करते हैं।
- स्वभाव: ये दिन में सक्रिय (diurnal) रहने वाले सामाजिक प्राणी हैं, जो 5 से 50 के झुंड में रहते हैं।
- जल की आवश्यकता: इन्हें नियमित रूप से पानी की जरूरत होती है, इसलिए ये स्थायी जल स्रोतों के पास पाए जाते हैं।
- संरक्षण स्थिति:
- वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972): अनुसूची-I (सर्वोच्च सुरक्षा)।
- IUCN रेड लिस्ट: ‘Least Concern’ (कम चिंताजनक)।
- CITES: परिशिष्ट-III (Appendix III)।
- राज्य पशु: यह पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश का राज्य पशु है।
- खतरे: अवैध शिकार, आवास का विनाश, आवारा कुत्तों का हमला और घास के मैदानों का कृषि भूमि में परिवर्तन।
- सांस्कृतिक महत्व: भारतीय संस्कृति में इसे पवित्रता और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। राजस्थान का बिश्नोई समुदाय इनके संरक्षण के लिए विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है।
- पारिस्थितिक तंत्र: कृष्णमृग ‘घास के मैदानों के प्रहरी’ माने जाते हैं। इनकी चराई से घास के मैदानों का स्वास्थ्य बेहतर होता है और आक्रामक वनस्पतियों पर नियंत्रण रहता है।
पुनरुद्धार कार्यक्रम:
- योजना: छत्तीसगढ़ राज्य वन्यजीव बोर्ड ने 2021-2026 के लिए एक महत्वाकांक्षी ‘कृष्णमृग पुनरुद्धार योजना’ शुरू की। बरनवापारा वन्यजीव अभयारण्य इसका मुख्य केंद्र बनाया गया।
- स्थानांतरण (Translocation): कुल 77 कृष्णमृग लाए गए, जिनमें से 50 राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (दिल्ली) से और 27 कानन पेंडारी चिड़ियाघर (बिलासपुर) से थे।
- सॉफ्ट-रिलीज विधि: इन जानवरों को सीधे जंगल में छोड़ने के बजाय पहले बड़े बाड़ों (Enclosures) में रखा गया ताकि वे स्थानीय जलवायु के अनुकूल हो सकें।
- सफलता के आंकड़े (2025-26): अक्टूबर 2025 की रिपोर्टों के अनुसार, बरनवापारा में अब लगभग 190 कृष्णमृग हैं, जिनमें से 100 से अधिक खुले जंगल में स्वतंत्र रूप से विचरण कर रहे हैं।
- भविष्य की योजना: इस सफलता के बाद अब गोमर्डा वन्यजीव अभयारण्य (रायगढ़) में भी कृष्णमृगों को बसाने की योजना है।
- आवास सुधार: आक्रामक प्रजातियों (Lantana आदि) को हटाकर स्थानीय रामपुर घास का रोपण किया गया।
