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कर्नल सोनम वांगचुक

कर्नल सोनम वांगचुक | Colonel Sonam Wangchuk

Colonel Sonam Wangchuk

संदर्भ:

कारगिल युद्ध के नायक और ‘लायन ऑफ लद्दाख’ के नाम से प्रसिद्ध कर्नल सोनम वांगचुक (महावीर चक्र विजेता) का 10 अप्रैल 2026 को 61 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लेह स्थित अपने आवास पर हृदय गति रुकने (heart attack) से उनका निधन हुआ।

कर्नल सोनम वांगचुक के बारे में: 

    • जन्म: 11 मई, 1964 को लद्दाख के लेह जिले के संकर गाँव में हुआ।
    • शिक्षा: उन्होंने दिल्ली के मॉडर्न स्कूल और श्री वेंकटेश्वर कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की।
    • कमीशन: 1987 में उन्हें असम रेजिमेंट की चौथी बटालियन में कमीशन मिला। बाद में उन्होंने लद्दाख स्काउट्स में अपनी सेवाएं दीं, जहाँ उन्होंने ‘पहाड़ी योद्धा’ के रूप में अपनी पहचान बनाई।
    • प्रमुख ऑपरेशन्स: उन्होंने श्रीलंका में ‘ऑपरेशन पवन’ और पूर्वोत्तर भारत (मणिपुर) में विद्रोह विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई।
  • व्यक्तित्व: कर्नल वांगचुक शांत और मानवीय स्वभाव के व्यक्ति थे, जिन्हें उनके साथी एक ‘Quiet Warrior’ (शांत योद्धा) के रूप में याद करते हैं।

‘लॉयन ऑफ लद्दाख’ का खिताब:

  • चोरबत ला की विजय: 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, तत्कालीन मेजर सोनम वांगचुक ने बटालिक सेक्टर में अदम्य साहस का परिचय दिया। 30-31 मई 1999 की रात को, मेजर वांगचुक ने लद्दाख स्काउट्स की एक टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए 18,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित चोरबत ला रिज लाइन पर कब्जा करने का अभियान चलाया।
  • दुश्मन का सफाया: भारी बर्फबारी और शून्य से नीचे के तापमान के बीच, उन्होंने बिना किसी तोपखाने के सहयोग के दुश्मन के ठिकानों पर हमला किया। उनकी टुकड़ी ने घुसपैठियों को खदेड़ दिया, जिससे भारत को बटालिक सेक्टर में रणनीतिक बढ़त मिली।
  • सम्मान: उनकी इस विशिष्ट वीरता के लिए उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च सैन्य सम्मान महावीर चक्र (MVC) से नवाजा गया। 

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • लद्दाख स्काउट्स (Ladakh Scouts): इसे “स्नो वॉरियर्स” के रूप में जाना जाता है। कर्नल वांगचुक इसी यूनिट के गौरव थे।
  • ऑपरेशन विजय: कारगिल युद्ध का कोड नाम, जिसमें कर्नल वांगचुक की भूमिका युद्ध के शुरुआती मोड़ के रूप में देखी जाती है।
  • रणनीतिक महत्व: बटालिक सेक्टर में घुसपैठ रोकना लेह-श्रीनगर राजमार्ग की सुरक्षा के लिए अनिवार्य था।
  • विरासत: बटालिक सेक्टर में दो अग्रिम चौकियों का नाम उनके सम्मान में ‘सोनम 1’ और ‘सोनम 2’ रखा गया है।

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