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नाइट पैरट

नाइट पैरट | Night Parrot

Night Parrot

संदर्भ:

हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के सुदूर रेगिस्तानी इलाकों में दुनिया के सबसे दुर्लभ और रहस्यमयी पक्षियों में से एक, नाइट पैरट या ‘निशाचर तोते’ की मौजूदगी की पुष्टि हुई। इसे ‘सॉन्गमीटर्स’ की मदद से ट्रैक किया गया।

नाइट पैरट के बारे में:

  • परिचय: ऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप के शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाया जाने वाला नाइट पैरट (वैज्ञानिक नाम: Pezoporus occidentalis) दुनिया के सबसे दुर्लभ और मायावी पक्षियों में से एक है। 
  • निशाचर प्रकृति: यह दुनिया के गिने-चुने निशाचर तोतों में से एक है, जो केवल रात में सक्रिय होता है।
  • रंग और बनावट: इसका शरीर पीला-हरा होता है जिस पर गहरे भूरे और काले रंग के धब्बे होते हैं, जो इसे ‘स्पिनिफेक्स’ घास में छिपने (Camouflage) में मदद करते हैं।
  • वजन: एक वयस्क नाइट पैरट का वजन लगभग 60 ग्राम होता है।
  • ध्वनि: इनकी पहचान विशिष्ट “डिंग-डिंग” (घंटी जैसी) और “क्रोक” जैसी आवाज़ों से की जाती है।
  • निवास स्थान: ये मुख्य रूप से पुरानी और परिपक्व ‘स्पिनिफेक्स’ (Spinifex) घास के झुरमुटों में रहते हैं, जो इन्हें दिन में सुरक्षा और ठंडक प्रदान करते हैं।
  • आहार: ये मुख्य रूप से शाकाहारी होते हैं और घास के बीजों (विशेषकर ट्रायोडिया) और जड़ी-बूटियों का सेवन करते हैं।
  • गतिशीलता: शोध से पता चला है कि ये भोजन और पानी की तलाश में एक रात में 40 किमी तक की यात्रा कर सकते हैं।
  • जनसंख्या अनुमान: वैज्ञानिकों का मानना है कि जंगली अवस्था में इनकी संख्या अब मात्र 40 से 250 के बीच बची है।
  • IUCN स्थिति: इसे गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया है। 

प्रमुख खतरे:

  • फेरल कैट्स और लोमड़ी: जंगली बिल्लियाँ और लोमड़ियाँ इनके अस्तित्व के लिए सबसे घातक शिकारी हैं।
  • असंतुलित आग: घास के मैदानों में लगने वाली भीषण आग इनके प्राकृतिक आवास ‘मैच्योर स्पिनिफेक्स’ को नष्ट कर देती है।
  • जलवायु परिवर्तन: लंबे सूखे के कारण जल स्रोतों की कमी इन्हें पानी के लिए लंबी दूरी तय करने पर मजबूर करती है, जहाँ ये शिकारियों के निशाने पर आ जाते हैं। 

संरक्षण के विशेष प्रयास:

  • स्वदेशी रेंजर: न्गुरुर्पा रेंजर जैसे स्थानीय समुदाय आधुनिक ऑडियो रिकॉर्डर (Songmeters) का उपयोग करके इनकी आवाज़ों की निगरानी कर रहे हैं।
  • तकनीकी उपयोग: पक्षियों की गतिविधियों को समझने के लिए उन्हें GPS टैग लगाया जा रहा है।
  • सांस्कृतिक महत्व: मइयावाली (Maiawali) लोग इसे ‘पुलेन पुलेन’ (Pullen Pullen) कहते हैं और उनके सम्मान में एक आरक्षित क्षेत्र भी बनाया गया है।

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