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अनाइमंगलम ताम्रपत्र

अनाइमंगलम ताम्रपत्र

anaimangalam copper plate

संदर्भ:

हाल ही में नीदरलैंड ने ऐतिहासिक सांस्कृतिक कूटनीति के तहत 11वीं सदी के प्रसिद्ध अनाइमंगलम ताम्रपत्र (जिन्हें यूरोप में ‘लीडेन प्लेट्स’ भी कहा जाता है) भारत को सुरक्षित वापस सौंप दिए हैं। चोल राजवंश के ये शाही दस्तावेज लगभग 300 वर्षों से अधिक समय से डच अभिरक्षा में थे। ये ताम्रपत्र नई दिल्ली में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपे जाएंगे, जो इनके सार्वजनिक प्रदर्शन का स्थान तय करेगा।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं चोल राजवंश:

  • शासक और काल: यह ताम्रपत्र मुख्य रूप से महान चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) के शासनकाल से संबंधित हैं। मूल मौखिक आदेश राजराजा प्रथम द्वारा दिया गया था, जिसे बाद में उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम के शासनकाल में इन तांबे की प्लेटों पर स्थायी रूप से उत्कीर्ण किया गया।
  • दस्तावेज की भाषा: यह एक द्विभाषी (Bilingual) चार्टर है। इसका प्रारंभिक ‘संस्कृत’ खंड चोल वंश की वंशावली और ईश्वरीय वैधता को दर्शाता है, जबकि ‘तमिल’ खंड में विस्तृत प्रशासनिक और भूमि राजस्व संबंधी निर्देश दर्ज हैं।
  • भौतिक विशेषताएं: कुल 21 बड़ी और 3 छोटी तांबे की प्लेटों का यह समूह लगभग 30 किलोग्राम वजनी है। ये सभी प्लेटें एक कांस्य/तांबे की अंगूठी से जुड़ी हैं, जिस पर राजेंद्र चोल प्रथम की शाही मुहर (Royal Seal) अंकित है। 

मुख्य विषयवस्तु: धार्मिक सहिष्णुता और कूटनीति

  • चूडामणि विहार को अनुदान: इन प्लेटों में नागापट्टिनम (तमिलनाडु) में निर्मित चूडामणि विहार (एक बौद्ध मठ) को ‘अनाइमंगलम’ गाँव से प्राप्त होने वाले भूमि राजस्व और करों के दान का कानूनी विवरण है।
  • अंतर्राष्ट्रीय संबंध: इस बौद्ध विहार का निर्माण वर्तमान इंडोनेशिया के श्रीविजय साम्राज्य के शासक श्री मार विजयोतुंगवर्मन ने अपने पिता की स्मृति में करवाया था।
  • सांस्कृतिक महत्व: यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि चोल साम्राज्य के हिंदू (शैव) शासक बौद्ध संस्थानों को संरक्षण देते थे, जो प्राचीन भारत के धार्मिक बहुलवाद (Religious Pluralism) और हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय समुद्री कूटनीति को उजागर करता है। 
स्रोत और इतिहास:
  • चोरी/हस्तांतरण: 18वीं शताब्दी की शुरुआत में जब नागापट्टिनम डच औपनिवेशिक नियंत्रण में था, तब एक डच मिशनरी/पादरी फ्लोरेंटियस कैंपर इन प्लेटों को अपने साथ ले गया था।
  • लीडेन विश्वविद्यालय: वर्ष 1862 में कैंपर के वंशजों ने इसे नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी को दान कर दिया, जहां इसे 160 से अधिक वर्षों तक ‘एशियन लाइब्रेरी’ में सुरक्षित रखा गया। 

सांस्कृतिक कूटनीति:

  • राजनयिक प्रयास: भारत सरकार ने इन प्लेटों की वापसी के लिए वर्ष 2012 से प्रयास शुरू किए थे। अक्टूबर 2023 में भारत ने इसे यूनेस्को (UNESCO) की ‘सांस्कृतिक संपत्ति की वापसी को बढ़ावा देने वाली अंतर-सरकारी समिति’ (ICPRCP) के एजेंडे में शामिल कराया।
  • डच नीति में बदलाव: नीदरलैंड सरकार द्वारा वर्ष 2022 में अपनाई गई प्रगतिशील औपनिवेशिक संपत्ति प्रत्यर्पण नीति के तहत लीडेन विश्वविद्यालय ने माना कि इन प्लेटों का अधिग्रहण अनैच्छिक था, जिससे इनकी बिना शर्त वापसी का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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