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UCBs और RCBs के लिए 3 वर्ष का अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड

UCBs और RCBs के लिए 3 वर्ष का अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड

Mandatory cooling-off period of 3 years for UCBs and RCBs

 

संदर्भ:

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने सहकारी बैंकिंग क्षेत्र में कॉरपोरेट गवर्नेंस (Corporate Governance) को सुदृढ़ करने के लिए शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) और ग्रामीण सहकारी बैंकों (RCBs) के निदेशकों (Directors) के लिए 3 वर्ष का अनिवार्य कूलिंग-ऑफ पीरियड (Cooling-off Period) लागू कर दिया है। 

  • यह कदम बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) की धारा 10A(2A)(i) के प्रावधानों को वास्तविक रूप से लागू करने के उद्देश्य से उठाया गया है। 

RBI की मुख्य घोषणा:

  • 10 वर्ष का कार्यकाल: सहकारी बैंक के बोर्ड में कोई भी निदेशक अधिकतम 10 वर्ष की निरंतर अवधि तक ही पद पर रह सकता है।
  • 3 वर्ष का अंतराल: 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद, उसी बैंक में पुनः निदेशक (चुनाव, सह-चयन या किसी अन्य माध्यम से) बनने के लिए न्यूनतम 3 वर्ष का कूलिंग-ऑफ अंतराल अनिवार्य है।
  • व्यापकता: यह नियम सभी शहरी सहकारी बैंकों (UCBs), राज्य सहकारी बैंकों (StCBs) और केंद्रीय सहकारी बैंकों (CCBs) पर समान रूप से लागू होगा।
  • तत्काल प्रभाव: RBI द्वारा जारी यह अंतिम निर्देश (Amendment Directions, 2026) तत्काल प्रभाव से लागू हो गए हैं। 

इस नीतिगत बदलाव की आवश्यकता क्यों पड़ी? 

  • कानूनी कमियों का दुरुपयोग रोकना: पूर्व में यह देखा गया कि कई निदेशक 10 वर्ष की वैधानिक सीमा से बचने के लिए कार्यकाल पूरा होने से ठीक पहले संक्षिप्त इस्तीफा दे देते थे। इसके तुरंत बाद वे पुनः निर्वाचित या सह-चयनित (Co-opted) होकर बोर्ड में वापस आ जाते थे।
  • कानून की मूल भावना की रक्षा: इस प्रकार के कृत्रिम अंतरालों (Artificial Breaks) के कारण बैंकिंग विनियमन अधिनियम की मूल भावना और वित्तीय अनुशासन प्रभावित हो रहा था।
  • वित्तीय हितों का टकराव: बोर्ड में लंबे समय तक एक ही व्यक्ति या गुट का वर्चस्व रहने से बैंकों के भीतर भाई-भतीजावाद, पसंदीदा कर्ज वितरण और वित्तीय धोखाधड़ी की आशंका बढ़ जाती थी। 

कार्यकाल की गणना और प्रतिबंध:

  • निरंतरता की परिभाषा: यदि किसी निदेशक के दो कार्यकालों के बीच का अंतराल 3 वर्ष से कम है, तो उस अंतराल को ब्रेक नहीं माना जाएगा और पिछले कार्यकाल को कुल समय में जोड़ा जाएगा।
  • कार्यकाल रीसेट: केवल तभी कार्यकाल की गणना शून्य (Reset) होगी जब बोर्ड से अलग होने की अवधि कम से कम 3 वर्ष या उससे अधिक हो।
  • कूलिंग-ऑफ के दौरान प्रतिबंध: इस 3 वर्ष की अवधि में वह व्यक्ति संबंधित बैंक में केवल एक सामान्य सदस्य या ग्राहक (Member/Customer) के रूप में ही जुड़ सकता है। वह बैंक के किसी भी प्रबंधकीय या प्रशासनिक निर्णय का हिस्सा नहीं बन सकता।
  • अन्य बैंकों के लिए छूट: हालांकि, कूलिंग-ऑफ की अवधि के दौरान वह व्यक्ति पात्रता शर्तों को पूरा करने पर किसी अन्य बैंक के बोर्ड में निदेशक बनने के लिए स्वतंत्र है।

प्रासंगिकता:

  • बैंकिंग कानून (संशोधन) अधिनियम, 2025 के माध्यम से निदेशकों के अधिकतम कार्यकाल को 8 वर्ष से बढ़ाकर 10 वर्ष किया गया था। वर्तमान कदम उसी संशोधन को पारदर्शी बनाने की अगली कड़ी है।
    • यह सुधार सहकारी बैंकों के बोर्ड में नेतृत्व के रोटेशन (Board Rotation) को बढ़ावा देगा, जिससे नए विचारों और व्यावसायिक प्रबंधन को अवसर मिलेगा।
  • दोहरे विनियमन की चुनौती: सहकारी बैंक ऐतिहासिक रूप से ‘राज्य सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार’ (प्रशासनिक मोर्चे पर) और ‘आरबीआई’ (बैंकिंग मोर्चे पर) के दोहरे नियंत्रण में रहे हैं।
    • वर्ष 2020 और 2025 के बैंकिंग विनियमन संशोधनों ने आरबीआई को इन बैंकों के बोर्ड को सुपरसीड करने और वित्तीय कुप्रबंधन पर सीधी कार्रवाई करने की अधिक शक्तियां दी हैं।
    • समावेशी वित्तीय समावेशन: सहकारी बैंक भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में वित्तीय समावेशन के प्राथमिक स्तंभ हैं। बोर्ड स्तर पर सुदृढ़ कॉरपोरेट गवर्नेंस से आम जनता और छोटे जमाकर्ताओं का भरोसा इन संस्थाओं पर मजबूत होगा।

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