दुर्लभ जंगली बिल्ली कैराकल (Rare Wild Cat Caracal)
संदर्भ:
मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले स्थित कूनो नेशनल पार्क में दशकों बाद कैमरा-ट्रैप में एक अत्यंत दुर्लभ जंगली बिल्ली कैराकल (Caracal) की मौजूदगी दर्ज की गई।
Rare Wild Cat “Caracal” के बारे मे:
- स्थानीय नाम: भारत में इसे पारंपरिक रूप से ‘स्याहगोश’ (Siyahgosh) कहा जाता है, जो एक फारसी शब्द है जिसका अर्थ है ‘काले कान’। संस्कृत दंतकथाओं में इसे ‘दीर्घकर्ण’ (लंबा कान) भी कहा गया है।
- शारीरिक संरचना: यह मध्यम आकार की बिल्ली है जिसका वजन लगभग 10 किलोग्राम से कम होता है।
- इसके बाल हल्के लाल-भूरे (Rufous/Sandy coat) होते हैं जो इसे मरुस्थलीय और शुष्क झाड़ियों में छलावरण (Camouflage) की अनूठी क्षमता प्रदान करते हैं।
- विशिष्ट पहचान: इसके कानों के अग्रभाग पर लंबे, काले बालों के गुच्छे (Black Tufts) होते हैं, जो इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इसके पिछले पैर काफी लंबे और मजबूत होते हैं।
- अद्भुत शिकारी क्षमता: इसे ‘फ्लाइंग कैट’ (Flying Cat) भी कहा जाता है क्योंकि यह हवा में 3 मीटर (लगभग 10 फीट) तक की ऊंची छलांग लगाकर उड़ते हुए पक्षियों को दबोचने में सक्षम है।
- व्यवहार: यह एक निशाचर (Nocturnal) और एकांतप्रिय (Solitary) जीव है, जिसके कारण इसे प्रकृति में देखना बेहद कठिन होता है।
- ऐतिहासिक और वर्तमान सीमा: ऐतिहासिक रूप से कैरकल भारत के 13 राज्यों में पाया जाता था। वर्तमान में भारत में इसकी आबादी अत्यंत सिमट चुकी है (संभावित रूप से 50-100 से कम)।
- यह मुख्य रूप से राजस्थान (रणथंभौर और थार मरुस्थल) और गुजरात (कच्छ का रन) के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों तक सीमित था। हाल ही में कूनो के अलावा मध्य प्रदेश के गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में भी इसे देखा गया है।
- प्रमुख खतरे (Threats):
- आवास का विनाश (Habitat Loss): कैरकल मुख्य रूप से ‘स्क्रबलैंड’ (झाड़ियों वाले वनों) और बंजर भूमियों में रहता है, जिन्हें अक्सर विकासात्मक कार्यों के लिए डाइवर्ट कर दिया जाता है।
- अवैध शिकार और व्यापार (Illegal Trade): ऐतिहासिक काल से ही राजा-महाराजाओं द्वारा इसे पक्षियों के शिकार के लिए पाला जाता था, आज भी विदेशी पालतू जीवों के बाजार में इसकी मांग अवैध शिकार को बढ़ावा देती है।
- शिकार की कमी (Prey Depletion): छोटे कृंतकों (Rodents) और पक्षियों की आबादी कम होने से इसके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
संरक्षण स्थिति:
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मानक / संगठन |
स्थिति (Status) |
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IUCN Red List |
वैश्विक स्तर पर ‘Least Concern’ (परंतु भारत में गंभीर संकटग्रस्त) |
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Wildlife (Protection) Act, 1972 |
Schedule-I (भारत में सर्वोच्च कानूनी सुरक्षा) |
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CITES |
Appendix I (एशियाई आबादी के लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार प्रतिबंधित) |
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Species Recovery Programme |
भारत के 22 गंभीर संकटग्रस्त जीवों की सूची में शामिल |
कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park):
- स्थिति: कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) मध्य प्रदेश के श्योपुर और मुरैना जिलों में विंध्य पहाड़ियों के पास स्थित है।
- स्थापना: इसकी स्थापना 1981 में वन्यजीव अभयारण्य के रूप में हुई थी, जिसे 2018 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया।
- क्षेत्रफल: यह उद्यान 748.76 वर्ग किलोमीटर के मुख्य क्षेत्र (Core Area) में फैला है।
- इसकी जीवन रेखा कूनो नदी है, जो चंबल नदी की एक मुख्य सहायक नदी है और इसे दो भागों में विभाजित करती है।
- वनस्पति: यहाँ की वनस्पति मुख्य रूप से शुष्क पर्णपाती वनों (Dry Deciduous) और विस्तृत सवाना घास के मैदानों (Savanna Grasslands) का मिश्रण है, जिसमें कर्दहई, खैर और सलाई के वृक्ष प्रमुख हैं।
- महत्व: पारिस्थितिक रूप से, कूनो ‘प्रोजेक्ट चीता’ (Project Cheetah) के वैश्विक केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है, जहां 2022 से नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के चीतों को बसाया गया है।
- चीतों के अलावा, यह भारतीय तेंदुए, सियार, सुस्त भालू, ढोल (जंगली कुत्ते), चौसिंगा, और हाल ही में देखे गए अत्यंत दुर्लभ कैरकल (स्याहगोश) का प्राकृतिक आवास है।
FAQs:
Q1. What is a Caracal?
कैराकल (Caracal caracal) मध्यम आकार की फुर्तीली जंगली बिल्ली है, जिसे भारत में इसके विशिष्ट काले गुच्छेदार कानों के कारण ‘स्याह-गोश’ (काला कान) कहा जाता है।
Q2. कैराकल को दुर्लभ जंगली बिल्ली क्यों कहा जाता है?
भारत में इसकी आबादी घटकर 50 से भी कम बची है। ऐतिहासिक निवास स्थान का 95% से अधिक क्षेत्र नष्ट होने के कारण यह विलुप्ति की कगार पर है।
Q3. Where is the Caracal found in India?
यह मुख्य रूप से राजस्थान (रणथंभौर, थार मरुस्थल), गुजरात (कच्छ का रन) और हाल ही में मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में पाई गई है।
Q4. What are the conservation challenges for Caracal?
सबसे बड़ी चुनौतियाँ शहरीकरण से पर्यावास का विनाश, शिकार (Prey Base) की कमी, अवैध शिकार और इनके आवासों को ‘बंजर भूमि’ वर्गीकृत करना हैं।
