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कॉर्पोरेट कानून संशोधन विधेयक 2026 (Corporate Laws Amendment Bill 2026) | Ankit Avasthi Sir

Corporate Laws Amendment Bill 2026

Corporate Laws Amendment Bill 2026

संदर्भ:

कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026: एक विस्तृत विश्लेषण

हाल ही में केंद्रीय वित्त और कॉर्पोरेट मामलों की मंत्री ने लोकसभा में कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया। जिसे वर्तमान में विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) को भेज दिया गया है। 

विधेयक के मुख्य उद्देश्य

यह विधेयक मुख्य रूप से दो प्रमुख कानूनों—कंपनी अधिनियम, 2013 और सीमित देयता भागीदारी (LLP) अधिनियम, 2008—में महत्वपूर्ण बदलाव करने का प्रस्ताव रखता है। इसके प्राथमिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं: 

  • व्यापार करने की सुगमता (Ease of Doing Business): अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाकर और डिजिटल माध्यमों को बढ़ावा देकर व्यवसायों के लिए माहौल को बेहतर बनाना।
  • अपराधमुक्त करना (Decriminalisation): छोटे तकनीकी और प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के लिए आपराधिक सजा के बजाय मौद्रिक जुर्माने का प्रावधान करना।
  • कॉर्पोरेट गवर्नेंस में सुधार: पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र निदेशकों और ऑडिट प्रक्रिया को और अधिक सशक्त बनाना। [6, 7, 8, 9, 10, 11]

कॉर्पोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के प्रमुख प्रावधान:

    • सीमा में वृद्धि: धारा 135(1) के तहत कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) की अनिवार्यता के लिए शुद्ध लाभ (Net Profit) की सीमा को ₹5 करोड़ से बढ़ाकर ₹10 करोड़ करने का प्रस्ताव है।
    • छूट: छोटे व्यवसायों पर बोझ कम करने के लिए ₹1 करोड़ से कम CSR खर्च वाली कंपनियों को ‘CSR समिति’ बनाने की आवश्यकता से छूट दी जा सकती है।
  • शेयर बायबैक और विलय: ऋण-मुक्त कंपनियों को अब एक वर्ष में दो बार बायबैक की अनुमति मिल सकती है (अभी यह सीमा वर्ष में एक बार है), जिसके बीच न्यूनतम 6 महीने का अंतर होना चाहिए।
  • फास्ट-ट्रैक विलय: गैर-सूचीबद्ध सहायक कंपनियों के विलय के लिए NCLT की मंजूरी की अनिवार्यता को कम कर प्रक्रियाओं को तेज किया जाएगा। 
  • हाइब्रिड और वर्चुअल मीटिंग: कंपनियों को अपनी वार्षिक आम बैठकें (AGM) और असाधारण बैठकें (EGM) पूरी तरह से वर्चुअल या हाइब्रिड मोड में करने की अनुमति दी जाएगी।
  • ई-कम्युनिकेशन: सूचीबद्ध कंपनियों के लिए सदस्यों को दस्तावेज केवल इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजना अनिवार्य किया जा सकता है।
  • NFRA की शक्ति: राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) को ऑडिट गुणवत्ता की निगरानी और दंड लगाने के लिए अधिक अधिकार और एक समर्पित फंड प्रदान किया जाएगा।
  • ऑडिटर्स का पंजीकरण: ऑडिटर्स के लिए NFRA के साथ अनिवार्य पंजीकरण और नियमित रिपोर्टिंग का प्रावधान प्रस्तावित है。
  • IBBI: भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) को ‘वैल्यूएशन अथॉरिटी’ के रूप में सशक्त किया जाएगा।
संयुक्त संसदीय समिति (JPC):

  • परिचय: यह भारतीय संसद की एक तदर्थ (Ad-hoc) या अस्थायी समिति है, जिसे किसी विशिष्ट विधेयक की जांच या सरकारी कार्यों में वित्तीय अनियमितताओं की गहन जांच के लिए गठित किया जाता है। 
  • गठन: इसका गठन तब होता है जब एक सदन (जैसे लोकसभा) प्रस्ताव पारित करता है और दूसरा सदन (राजसभा) उस पर सहमति देता है।
  • सदस्यता: इसमें संसद के दोनों सदनों (सत्तारूढ़ और विपक्ष) के सदस्य शामिल होते हैं। सामान्यतः इसमें 31 सदस्य होते हैं, जिनमें 21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से होते हैं (लोकसभा के सदस्य राज्यसभा से दोगुने होते हैं)।
  • शक्तियाँ: JPC के पास मौखिक या लिखित प्रमाण एकत्र करने और किसी भी व्यक्ति या संस्था को पूछताछ के लिए समन (बुलाने) करने का अधिकार होता है। इसकी कार्यवाही गोपनीय होती है।
  • कार्यकाल: रिपोर्ट संसद में पेश करने के बाद यह समिति स्वतः भंग हो जाती है। इसकी सिफारिशें सरकार के लिए सलाहकारी होती हैं, अनिवार्य नहीं।
  • महत्व:
  • गहन विश्लेषण: जब संसद के पास समय की कमी होती है, तब JPC विधेयकों के तकनीकी पहलुओं की बारीकी से जांच करती है।
  • जवाबदेही: यह सरकार की नीतियों और कार्यों पर विधायी नियंत्रण सुनिश्चित करती है।

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