E30 पेट्रोल संबंधी मानक

संदर्भ:
हाल ही में भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने देश में जैव ईंधन पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए E30 एथिल अल्कोहल (एथेनॉल) मिश्रित पेट्रोल के आधिकारिक मानकों को अधिसूचित किया।
अधिसूचना के मुख्य बिंदु:
भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा भारतीय मानक ब्यूरो नियम, 2018 के नियम 15(1) के अंतर्गत जारी आधिकारिक राजपत्र (Gazette) अधिसूचना के मुख्य वैधानिक एवं तकनीकी निर्देश निम्नलिखित हैं:
- मानक कोड एवं प्रवर्तन: BIS द्वारा इस विनियमन को IS 19850:2026 मानक कोड आवंटित किया गया है, जो 15 मई 2026 से आधिकारिक रूप से प्रभावी हो चुका है।
- उच्च सम्मिश्रण ग्रेड का निर्धारण: अधिसूचना में E22, E25, E27 और E30 नामक चार नए एथेनॉल-पेट्रोल संकर ग्रेड्स को विनियमित किया गया है। यह देश की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत 2030 तक 30% सम्मिश्रण के दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य का आधार है।
- इंजन प्रणालियों के लिए दिशा-निर्देश: यह विनिर्देश मुख्य रूप से पॉजिटिव इग्निशन इंजन (Positive Ignition Engine) वाले वाहनों में उपयोग होने वाले मोटर गैसोलीन और निर्जल एथेनॉल के मिश्रण को मानकीकृत करने का वैधानिक निर्देश देता है।
- कड़े तकनीकी मापदंड: अधिसूचना के तहत ईंधन की रासायनिक स्थिरता, ऑक्टेन रेटिंग, सल्फर सीमा, वाष्प दबाव, स्वीकार्य जल सामग्री और संक्षारण प्रतिरोध के लिए कड़े गुणवत्ता नियंत्रण पैरामीटर अनिवार्य किए गए हैं।
- प्रयोगात्मक अध्ययन का निर्देश: पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) को वर्तमान E10 और E20 संगत वाहनों पर E25 ईंधन के व्यावहारिक प्रभावों (जैसे माइलेज और इंजन लाइफ) का गहन तकनीकी मूल्यांकन करने का निर्देश दिया है।
- नियामक ढांचा बनाम वाणिज्यिक रोलआउट: यह अधिसूचना केवल एक वैधानिक तकनीकी ढांचा प्रदान करती है। यह देश भर के ईंधन खुदरा केंद्रों (FROs) पर इन उच्च ग्रेड्स की तत्काल अनिवार्य वाणिज्यिक बिक्री का आदेश नहीं देती है।
महत्व:
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ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान (जैसे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज संकट) के बीच यह कदम भारत की ऊर्जा संप्रभुता सुनिश्चित करने में गेम-चेंजर है। E20 के बाद E30 मानक देश के आयात बिल में अरबों डॉलर की बचत का मार्ग प्रशस्त करता है।
- उत्सर्जन में कमी: उच्च एथेनॉल मिश्रण से वाहनों से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), हाइड्रोकार्बन और पार्टिकुलेट मैटर (PM) में भारी कमी आती है।
- जलवायु प्रतिबद्धता: यह कदम पेरिस समझौते के तहत भारत के ‘नैशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन्स’ (NDCs) और 2070 तक ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में सहायक है।
- कृषि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन: यह नीति राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति, 2018 के उद्देश्यों के अनुरूप है। घरेलू स्तर पर अधिशेष गन्ना, मक्का और क्षतिग्रस्त खाद्यान्नों का उपयोग एथेनॉल उत्पादन के लिए बढ़ाकर किसानों की आय दोगुनी करने और ग्रामीण रोजगार सृजन में सहायक है।