foot and mouth disease

संदर्भ:
हाल ही में गुजरात सरकार ने राज्य के पशुधन को बचाने और किसानों की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए फुट एंड माउथ डिजीज (FMD – खुरपका-मुँहपका रोग) टीकाकरण अभियान शुरू किया है। यह अभियान राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP) का हिस्सा है।
खुरपका-मुँहपका रोग (Foot and Mouth Disease – FMD) क्या हैं?
यह एक संक्रामक और घातक विषाणुजनित बीमारी है, जो मुख्य रूप से विभक्त-खुर (Cloven-hoofed) वाले पशुओं जैसे गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर को प्रभावित करती है।
- रोग का कारक: यह बीमारी एफ्थोवायरस (Aphthovirus) के कारण होती है, जो पिकोर्नाविरीडे (Picornaviridae) परिवार का सदस्य है। इस वायरस के सात प्रमुख सेरोटाइप (O, A, C, SAT 1, SAT 2, SAT 3, और Asia 1) हैं। भारत में मुख्य रूप से O, A और Asia 1 सेरोटाइप सक्रिय रहते हैं।
- संक्रमण का प्रसार: FMD वायरस बहुत तेजी से फैलता है। इसके प्रसार के मुख्य मार्ग निम्नलिखित हैं:
- सीधा संपर्क: संक्रमित पशु के लार, मूत्र, मल, दूध या वीर्य के सीधे संपर्क में आने से।
- हवा के माध्यम से: संक्रमित पशु के छींकने या खांसने से वायरस एयरोसोल के रूप में दूर तक फैल सकता है।
- दूषित वस्तुएं: संक्रमित चारे, पानी, पशुपालकों के कपड़े, जूते या दूषित उपकरणों के माध्यम से।
प्रमुख लक्षण:
- तेज बुखार: पशु का तापमान अचानक $104^\circ\text{F}$ से $106^\circ\text{F}$ तक पहुंच जाता है।
- मुँह में छाले: जीभ, मसूड़ों और होंठों के अंदर छोटे-छोटे दाने उभर आते हैं जो बाद में बड़े छालों में बदलकर फूट जाते हैं और घाव बना देते हैं।
- लार टपकना: मुँह के छालों के कारण पशु के मुँह से चिपचिपी और डोरीदार लार (Ropey Saliva) निरंतर गिरती रहती है।
- खुरों में घाव: खुरों के बीच की जगह में घाव होने से पशु को चलने में अत्यधिक पीड़ा होती है और वह लंगड़ाने लगता है।
- दूध उत्पादन में कमी: दुधारू पशुओं में दूध देने की क्षमता अचानक बहुत कम हो जाती है।
आर्थिक प्रभाव:
- दुग्ध उत्पादन: दूध उत्पादन में भारी गिरावट आती है, जिससे पशुपालकों की आय कम हो जाती है।
- निर्यात पर असर: वैश्विक व्यापार मानकों के कारण FMD प्रभावित क्षेत्रों से मांस और दुग्ध उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध लग जाता है।
- प्रजनन क्षमता: संक्रमित पशुओं में गर्भपात की समस्या या बांझपन की संभावना बढ़ जाती है।
बचाव और नियंत्रण:
- टीकाकरण: पशुओं को साल में दो बार (छह महीने के अंतराल पर) नियमित टीकाकरण करवाना चाहिए।
- पृथक्करण: बीमार पशु को तुरंत स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए।
- स्वच्छता: प्रभावित परिसर को कीटाणुनाशक (जैसे 2% सोडियम कार्बोनेट) से साफ करना चाहिए और मृत पशु या दूषित चारे को सुरक्षित रूप से नष्ट करना चाहिए।
राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (NADCP):
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