Kalinjar Fort Hill declared as National Geo-Heritage Site

संदर्भ:
हाल ही में भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने उत्तर प्रदेश स्थित ऐतिहासिक कालिंजर किले की पहाड़ी को आधिकारिक तौर पर ‘नेशनल जियो-हेरिटेज साइट’ (National Geo-Heritage Site) घोषित किया। यह घोषणा भारत की भूवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।
नेशनल जियो-हेरिटेज साइट का अर्थ:
नेशनल जियो-हेरिटेज साइट्स वे भौगोलिक क्षेत्र हैं जो राष्ट्रीय महत्व के हैं और पृथ्वी के विकास, भू-विज्ञान के इतिहास, या शिक्षा के लिए वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, सौंदर्य या शैक्षिक मूल्य प्रदान करते हैं। GSI इन साइटों की सुरक्षा और रखरखाव के लिए जिम्मेदार है।
कालिंजर किला (Kalinjar Fort):
- स्थान: यह उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में विंध्य पर्वतमाला की 800-900 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जो भारत के सबसे विशाल और अजेय दुर्गों में से एक है।
- स्थापना: इस किले का इतिहास 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच चंदेल शासकों के उत्कर्ष से जुड़ा है, जिन्होंने इसे अपनी शक्ति का केंद्र बनाया। हालांकि, इसका उल्लेख महाभारत और बौद्ध साहित्य में भी मिलता है।
- अजेय दुर्ग: अपनी खड़ी ढलान और 5 मीटर मोटी दीवारों के कारण इसे जीतना लगभग असंभव था। महमूद गजनवी, कुतुबुद्दीन ऐबक और हुमायूं जैसे शासकों ने इसे जीतने का प्रयास किया लेकिन लंबे समय तक विफल रहे।
- शेरशाह सूरी का अंत: 1545 ई. में अफगान शासक शेरशाह सूरी की इस किले की घेराबंदी के दौरान बारूद विस्फोट में मृत्यु हो गई थी। अंततः 1569 में अकबर ने इसे जीतकर बीरबल को उपहार में दिया था।
किले की प्रमुख विशेषताएं:
- नीलकंठ महादेव मंदिर: यह किले का सबसे पवित्र स्थान है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव ने यहीं विषपान कर ‘काल’ (मृत्यु) पर विजय प्राप्त की थी. यहाँ नीले पत्थर का शिवलिंग है जिससे प्राकृतिक रूप से पानी रिसता रहता है।
- प्रवेश द्वार: किले में प्रवेश के लिए सात भव्य दरवाजे हैं, जिनमें आलमगीर दरवाजा, गणेश द्वार और हनुमान द्वार मुख्य हैं।
- जल प्रबंधन: पहाड़ी पर होने के बावजूद यहाँ जल की कमी नहीं होती। पातालगंगा, पांडव कुंड और कोठतीर्थ जैसे जलाशय प्राचीन इंजीनियरिंग के बेहतरीन उदाहरण हैं।
- मूर्तियाँ और नक्काशी: यहाँ काल भैरव की 18 भुजाओं वाली विशाल प्रतिमा और चट्टानों पर उकेरी गई विभिन्न देवी-देवताओं की आकृतियाँ वास्तुकला की दृष्टि से बेजोड़ हैं।
इस घोषणा का मुख्य कारण:
- एपार्चियन अनकन्फॉर्मिटी (Eparchaean Unconformity): यहाँ लगभग 2.5 अरब वर्ष पुराने ‘बुंदेलखंड ग्रेनाइट’ और 1.2 अरब वर्ष पुराने ‘कैमूर बलुआ पत्थर’ के बीच एक सीधा संपर्क है। यह पृथ्वी के इतिहास के लगभग 1.3 अरब वर्षों के गायब रिकॉर्ड को दर्शाता है।
- भूवैज्ञानिक विकास का अध्ययन: यह स्थल बुंदेलखंड क्रेटन (Craton) और विंध्य सुपरग्रुप के मिलन को प्रदर्शित करता है, जो वैज्ञानिकों को पृथ्वी की पपड़ी (Crust) के विकास को समझने में प्राचीन जल इंजीनियरिंग: यहाँ की चट्टानों को काटकर बनाई गई ‘पातालगंगा’ जैसी जल संरचनाएं प्राचीन मनुष्यों द्वारा भूवैज्ञानिक ज्ञान के उपयोग का उत्कृष्ट प्रमाण हैं।
- संरक्षण और भू-पर्यटन: GSI का उद्देश्य इन दुर्लभ चट्टानी संरचनाओं को खनन से बचाना और इसे खजुराहो-चित्रकूट पर्यटन सर्किट से जोड़कर स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है।