कल्पसर परियोजना

संदर्भ:
हाल ही में भारत और नीदरलैंड ने गुजरात की महत्वाकांक्षी कल्पसर परियोजना (Kalpasar Project) के लिए एक तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए।
- प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान, भारत के जल शक्ति मंत्रालय और नीदरलैंड के इन्फ्रास्ट्रक्चर और जल प्रबंधन मंत्रालय के बीच इस संबंध में एक ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ (LoI) का आदान-प्रदान किया गया।
कल्पसर परियोजना क्या हैं?
कल्पसर परियोजना (Kalpasar Project), जिसे आधिकारिक तौर पर खंभात की खाड़ी विकास परियोजना (Gulf of Khambhat Development Project) कहा जाता है, गुजरात सरकार की एक अत्यंत महत्वाकांक्षी, बहुउद्देशीय और विश्व की सबसे बड़ी तटीय इंजीनियरिंग पहलों में से एक है। इस परियोजना की मूल परिकल्पना समुद्री पर्यावरण के भीतर विश्व का सबसे बड़ा मानव निर्मित मीठे पानी का जलाशय बनाना है।
कल्पसर परियोजना की विशेषताएं:
- भौगोलिक अवस्थिति: यह परियोजना गुजरात के भावनगर (सौराष्ट्र) और भरूच (दक्षिण गुजरात) जिलों के बीच खंभात की खाड़ी के पार स्थित है।
- समुद्री बांध (Sea Dam): इसके तहत समुद्र के ऊपर लगभग 30 किलोमीटर लंबा बांध बनाने का प्रस्ताव है।
- पहले इसकी लंबाई 64 किमी प्रस्तावित थी, लेकिन आधुनिक तकनीकी अध्ययनों के बाद इसके एलाइनमेंट को उत्तर की ओर स्थानांतरित कर 30 किमी किया गया है।
- नदियों का संगम: खंभात की खाड़ी में गिरने वाली प्रमुख नदियां—नर्मदा, माही, साबरमती, ढाढर और लिम्बडी-भोगवो—का मीठा पानी इस बांध के पीछे रोककर संचित किया जाएगा।
- भदभूत बैराज (Bhadbhut Barrage): यह इस वृहद् परियोजना का एक प्रमुख सहायक घटक है, जो नर्मदा नदी के मुहाने पर मीठे पानी को रोकने और खारे पानी के प्रवेश को नियंत्रित करने के लिए बनाया जा रहा है।
- विशाल जलाशय क्षमता: यह बांध समुद्र के भीतर लगभग 10 बिलियन क्यूबिक मीटर (10,000 MCM) मीठे पानी का भंडारण करेगा। यह क्षमता गुजरात के कुल वार्षिक सतही जल प्रवाह का लगभग 25% है।
- परिवहन क्रांति (10-लेन रोड लिंक): बांध के ऊपरी हिस्से पर 10-लेन का एक्सप्रेसवे और रेल कॉरिडोर प्रस्तावित है।
- इससे सौराष्ट्र (भावनगर) और दक्षिण गुजरात (सूरत/दाहेज) के बीच की सड़क दूरी 240 किलोमीटर से घटकर मात्र 60 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे ईंधन और समय की भारी बचत होगी।
- नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता: समुद्र के इस बंद हिस्से के आसपास 1500 मेगावाट (MW) पवन ऊर्जा और 1000 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए बुनियादी ढांचा विकसित किया जाएगा। (शुरुआती योजनाओं में शामिल ज्वारीय ऊर्जा घटक को वर्तमान में व्यावहारिक कारणों से हटा दिया गया है)।
- नीदरलैंड का सहयोग: इस विशाल भू-तकनीकी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने नीदरलैंड के साथ तकनीकी समझौता किया है। डच सरकार का प्रसिद्ध 32 किमी लंबा अफस्लूटडिज्क बांध (Afsluitdijk Dam), जिसने खारे समुद्र को मीठे पानी की झील में बदल दिया, कल्पसर के लिए तकनीकी रोल-मॉडल है।
सामाजिक-आर्थिक लाभ:
- कृषि का कायाकल्प: इस जलाशय से सौराष्ट्र क्षेत्र के 9 जिलों के 42 तालुकों की लगभग 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई का पानी मिलेगा, जिससे सूखाग्रस्त क्षेत्रों में कृषि उत्पादन बढ़ेगा।
- पेयजल और औद्योगिक आपूर्ति: यह विशाल जल निकाय धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (Dholera SIR) और आसपास के मेगा औद्योगिक कॉपोर्रेट्स के साथ-साथ करोड़ों नागरिकों को स्थायी पेयजल सुरक्षा प्रदान करेगा।
- भूमि सुधार (Land Reclamation): खाड़ी के परिधीय क्षेत्रों में खारे पानी का प्रभाव समाप्त होने से लगभग 1.76 लाख हेक्टेयर तटीय भूमि को कृषि और विकास के योग्य (Reclaim) बनाया जा सकेगा।
- मत्स्य पालन का विकास: जलाशय में मीठे पानी की मछली पकड़ने (Inland Fisheries) और जलीय कृषि को बढ़ावा देकर स्थानीय मछुआरा समुदायों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएंगे।
प्रमुख चुनौतियाँ:
- गाद एकत्र होना (Sedimentation): खाड़ी में गिरने वाली नदियां अपने साथ अत्यधिक गाद लाती हैं। जलाशय में मिट्टी जमा होने से उसकी गहराई और भंडारण क्षमता समय के साथ प्रभावित होने का जोखिम है।
- पारिस्थितिकी और पर्यावरण (EIA): समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के अचानक मीठे पानी में बदलने से स्थानीय समुद्री जीवों और मैंग्रोव वनों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
वर्तमान स्थिति:
गुजरात सरकार के अनुसार, कल्पसर परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) अब अपने अंतिम चरण में है। इसके लिए विभिन्न महासागरीय, हाइड्रोलॉजिकल और पर्यावरणीय अध्ययन पूरे किए जा चुके हैं। केंद्रीय और राज्य स्तरीय पर्यावरण स्वीकृतियां मिलने के बाद, वास्तविक निर्माण कार्य शुरू होने की तिथि से इस मेगा प्रोजेक्ट को अगले 8 वर्षों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस परियोजना की अनुमानित लागत ₹90,000 करोड़ से अधिक आंकी गई है।