ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा

संदर्भ:
18 मई 1974 को बुद्ध पूर्णिमा के पावन दिन भारत ने राजस्थान के पोखरण मरुस्थल में अपना पहला सफल भूमिगत परमाणु परीक्षण किया था, जिसे ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा (पोखरण-I) नाम दिया गया।
परीक्षण की पृष्ठभूमि:
- सुरक्षा चुनौतियाँ: वर्ष 1962 में चीन के साथ युद्ध में मिली पराजय और 1964 में चीन द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण (लोप नोर) ने भारत के समक्ष गंभीर सुरक्षा संकट खड़ा कर दिया था।
- इसके बाद 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों ने भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया।
- वैश्विक भेदभावपूर्ण नीतियां: परमाणु अप्रसार संधि (NPT, 1968) के भेदभावपूर्ण रवैये के कारण भारत ने इस पर हस्ताक्षर करने से स्पष्ट इनकार कर दिया, क्योंकि यह संधि परमाणु-सशस्त्र देशों के एकाधिकार को बनाए रखती थी।
- वैज्ञानिक नेतृत्व: भारत के परमाणु कार्यक्रम की नींव डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने रखी थी।
- इस परीक्षण को परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) के तत्कालीन अध्यक्ष होमी सेठना और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के निदेशक डॉ. राजा रमन्ना के कुशल वैज्ञानिक नेतृत्व में अंजाम दिया गया।
तकनीकी विशिष्टताएँ:
- प्रौद्योगिकी: यह एक प्लूटोनियम-आधारित इम्प्लोजन (अंतःस्फोट) डिवाइस थी, जो नाभिकीय विखंडन (Fission) के सिद्धांत पर आधारित थी।
- क्षमता (Yield): इसकी मारक क्षमता लगभग 8 से 13 किलोटन टीएनटी (TNT) आंकी गई थी, जो हिरोशिमा पर गिराए गए बम के समतुल्य थी।
- सामग्री का स्रोत: इस परीक्षण के लिए प्लूटोनियम का निर्माण भारत के सायरस (CIRUS) रिएक्टर में किया गया था, जिसे कनाडा के सहयोग से स्थापित किया गया था और जिसमें प्रयुक्त भारी जल अमेरिका द्वारा दिया गया था।
‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’ (PNE) का सिद्धांत:
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत सरकार ने इसे “शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट” (Peaceful Nuclear Explosion – PNE) घोषित किया।
- भारत ने स्पष्ट किया कि इस परीक्षण का उद्देश्य सैन्य उपयोग न होकर खनन, इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे विकासात्मक कार्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण लाभ उठाना था।
- भारत ने विश्व को यह संदेश दिया कि वह परमाणु तकनीक तो रखता है, लेकिन तत्काल इसका सैन्यीकरण (Weaponization) नहीं करना चाहता।
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया और वैश्विक प्रभाव:
यह परीक्षण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के पांच स्थायी सदस्यों (P-5: अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन) के बाहर किसी भी देश द्वारा किया गया पहला परमाणु परीक्षण था। इसके परिणामस्वरूप तीव्र वैश्विक प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं:
- प्रतिबंध और प्रतिबंधात्मक नीतियां: अमेरिका और कनाडा ने भारत के इस कदम की कड़ी निंदा की और तकनीकी सहायता रोक दी। कनाडा ने अपने जारी परमाणु ऊर्जा सहयोग और रिएक्टरों की आपूर्ति को तुरंत निलंबित कर दिया।
- न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) का गठन: इस परीक्षण की प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया के रूप में वर्ष 1974 में ही ‘लंदन क्लब’ या न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) की स्थापना की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य भारत जैसे देशों को परमाणु सामग्री और संवेदनशील तकनीकों के निर्यात पर कठोर नियंत्रण लगाना था।
- क्षेत्रीय समीकरण: इस परीक्षण ने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बदल दिया। इसके जवाब में पाकिस्तान ने अपने गुप्त परमाणु कार्यक्रम की गति को अत्यधिक तीव्र कर दिया।
सामरिक एवं भू-राजनीतिक महत्व:
- रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy): पोखरण-I ने सिद्ध किया कि अत्यधिक वैश्विक दबाव और प्रतिबंधों के बावजूद भारत अपनी संप्रभुता और विदेश नीति के फैसलों में पूरी तरह स्वतंत्र है।
- स्वदेशी क्षमता का प्रदर्शन: अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच भारतीय वैज्ञानिकों ने पूरी तरह स्वदेशी अनुसंधान के बल पर इस जटिल तकनीक को हासिल कर देश की आत्मनिर्भरता को रेखांकित किया।
- पोखरण-II का मार्ग प्रशस्त: 1974 की इस नींव के कारण ही भारत मई 1998 में ‘ऑपरेशन शक्ति’ (पोखरण-II) करने में सफल रहा, जिसके बाद भारत ने स्वयं को एक पूर्ण परमाणु-सशस्त्र राष्ट्र घोषित किया।