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महिलाओं के अधिकारिता संबंधी संसदीय समिति

महिलाओं के अधिकारिता संबंधी संसदीय समिति

Parliamentary Committee on Empowerment of Women

संदर्भ:

हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने वर्ष 2026-27 के लिए महिलाओं के अधिकारिता संबंधी संसदीय समिति (Committee on Empowerment of Women) का पुनर्गठन किया, जिसकी कमान वरिष्ठ सांसद डॉ. डग्गुबाती पुरन्देश्वरी को सौंपी गई है।

महिलाओं के अधिकारिता संबंधी संसदीय समिति (Parliamentary Committee on Empowerment of Women) क्या हैं?

यह संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सदस्यों से मिलकर बनी एक संयुक्त स्थायी संसदीय समिति (Joint Parliamentary Standing Committee) है। 

  • यह दलीय राजनीति से ऊपर उठकर केंद्र सरकार द्वारा महिलाओं के कल्याण, गरिमा, और लैंगिक समानता के लिए उठाए गए कदमों की समीक्षा तथा अनुवीक्षण करती है।
  • इस समिति का गठन पहली बार 29 अप्रैल, 1997 को 11वीं लोकसभा के दौरान किया गया था।
  • अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च, 1996) के अवसर पर संसद के दोनों सदनों में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए सर्वसम्मति से दो समान प्रस्ताव पारित किए गए थे।

उद्देश्य:

  • लैंगिक समानता सुनिश्चित करना: भारतीय समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान स्तर, अवसर और अधिकार प्रदान करने की वकालत करना।
  • संवैधानिक प्रावधानों का क्रियान्वयन: संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के तहत महिला केंद्रित सुरक्षात्मक उपायों की निगरानी करना।
  • नीतिगत सुधार और जवाबदेही: केंद्र सरकार की विभिन्न महिला-केंद्रित योजनाओं की प्रभावशीलता की जांच करना और उनमें आवश्यक सुधारों की सिफारिश करना। 

संवैधानिक आधार: 

  • संसदीय नियम: लोकसभा के कार्य संचालन और प्रक्रिया के नियमों (Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha) के तहत इसका गठन होता है।
  • संवैधानिक दर्शन: यह समिति अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता), अनुच्छेद 15 (लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध व राज्य द्वारा महिलाओं के पक्ष में विशेष प्रावधान), और अनुच्छेद 39 व 42 (प्रसूति सहायता और न्यायसंगत कार्यदशाएं) को व्यावहारिक रूप से लागू करने का मुख्य संसदीय माध्यम है। 

संरचना:

  • कुल सदस्य: समिति में कुल 30 सदस्य होते हैं。
  • लोकसभा: 20 सदस्य, जिन्हें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा मनोनीत किया जाता है।
  • राज्यसभा: 10 सदस्य, जिन्हें राज्यसभा के सभापति द्वारा मनोनीत किया जाता है।
  • कार्यकाल: समिति का कार्यकाल 1 वर्ष से अधिक नहीं होता है तथा प्रतिवर्ष इसका पुनर्गठन किया जाता है।
  • अध्यक्षता: समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लोकसभा सदस्यों में से की जाती है (जैसे वर्तमान 2026-27 के कार्यकाल हेतु डॉ. डग्गुबाती पुरन्देश्वरी को अध्यक्ष नियुक्त किया गया है)।
  • विशेष नियम: कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता। 

मुख्य कार्य:

  • NCW की रिपोर्टों की जांच: राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) द्वारा राष्ट्रपति को सौंपी गई वार्षिक और विशेष रिपोर्टों पर विचार करना तथा उनके क्रियान्वयन की सिफारिश करना।
  • कल्याणकारी योजनाओं का मूल्यांकन: केंद्र सरकार के मंत्रालयों द्वारा संचालित योजनाओं (जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, पोषण अभियान, उज्ज्वला योजना) के जमीनी प्रभाव की समीक्षा करना।
  • समान प्रतिनिधित्व की समीक्षा: विधायी निकायों, लोक सेवाओं, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं के पर्याप्त प्रतिनिधित्व और शिक्षा की स्थिति की जांच करना।
  • विशिष्ट मामलों की जांच: कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (POSH Act) की प्रभावशीलता या सदन द्वारा भेजे गए किसी विशेष महिला-अधिकार विषय की विस्तृत विवेचना करना।

प्रमुख उपलब्धियां:

  • नीतिगत सुधारों में योगदान: समिति ने ‘असंगठित और गिग अर्थव्यवस्था (Gig Economy) में महिलाओं की स्थिति’ पर ऐतिहासिक रिपोर्ट सौंपकर श्रम कानूनों में सुधार का मार्ग प्रशस्त किया है।
  • POSH अधिनियम की व्यापक समीक्षा: हाल ही में समिति ने विभिन्न केंद्रीय संस्थानों (जैसे ICAR, बैंकिंग क्षेत्र) में POSH अधिनियम, 2013 के कड़े कार्यान्वयन और आंतरिक शिकायत समितियों (ICC) की पारदर्शिता की जमीनी स्तर पर जांच की है।
  • वित्तीय समावेशन की वकालत: ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए ‘सिंगल विंडो क्रेडिट सिस्टम’ (एकल खिड़की ऋण प्रणाली) और वित्तीय सहायता को सुगम बनाने में समिति की सिफारिशों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • विधायी संवेदीकरण: इस समिति ने संसद के पटल पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जेंडर बजटिंग (Gender Budgeting) और विमेन-लेड डेवलपमेंट (महिला-नेतृत्व वाले विकास) की अवधारणा को मुख्यधारा की बहसों में स्थापित किया है।

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