रासबिहारी बोस

संदर्भ:
हाल ही में 25 मई 2026 को महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके अदम्य साहस, असाधारण संगठनात्मक कौशल और स्वतंत्रता संग्राम में उनके अमूल्य योगदान को याद किया गया।
रासबिहारी बोस के बारे में:
महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस (25 मई 1886 – 21 जनवरी 1945) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन चुनिंदा राष्ट्रनायकों में से हैं, जिन्होंने देश की आजादी की लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय धरातल प्रदान किया।
- प्रारंभिक जीवन: रास बिहारी बोस का जन्म बंगाल के बर्धमान जिले के सुबलदहा गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा चंदननगर (जो उस समय एक फ्रांसीसी उपनिवेश था) के डूप्लेक्स कॉलेज से पूरी की।
- वैचारिक प्रभाव: फ्रांसीसी उपनिवेश में रहने के कारण वे 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों से गहरे प्रभावित हुए। इसके अतिरिक्त बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ और नवीन चंद्र सेन की रचनाओं ने उनमें तीव्र देशभक्ति की भावना जागृत की।
- प्रशासनिक सेवा: क्रांतिकारी गतिविधियों में पूरी तरह सक्रिय होने से पहले उन्होंने देहरादून के फारेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) में एक हेड क्लर्क के रूप में भी कार्य किया था।
भारत में प्रमुख क्रांतिकारी गतिविधियां:
रास बिहारी बोस भारत के भीतर बंगाल, पंजाब और संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के क्रांतिकारियों को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी थे। उनके नेतृत्व में दो बड़े ऐतिहासिक घटनाक्रम हुए:
- दिल्ली-लाहौर षड्यंत्र केस (1912): जब ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया जा रहा था, तब 23 दिसंबर 1912 को दिल्ली के चांदनी चौक में वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना रास बिहारी बोस ने ही बनाई थी।
- हालांकि हार्डिंग इस हमले में बच गया, लेकिन इस घटना ने ब्रिटिश साम्राज्य को हिला कर रख दिया। ब्रिटिश खुफिया तंत्र से बचते हुए वे भेष बदलने की अपनी अद्भुत कला के कारण कभी पकड़े नहीं गए।
- गदर आंदोलन और सैन्य विद्रोह (1915): प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने गदर पार्टी के नेताओं (जैसे लाला हरदयाल और करतार सिंह सराभा) के साथ मिलकर ब्रिटिश भारतीय सेना के भीतर एक व्यापक सशस्त्र विद्रोह की योजना तैयार की थी।
- इस गदर विद्रोह की तारीख 21 फरवरी 1915 तय की गई थी। परंतु, एक गद्दार (कृपाल सिंह) द्वारा सूचना लीक कर देने के कारण यह योजना विफल हो गई और कई क्रांतिकारी पकड़े गए।
जापान पलायन और अंतरराष्ट्रीय चरण:
भारत में अपनी गिरफ्तारी की वारंट जारी होने के बाद, वे 1915 में ‘पी.एन. टैगोर’ के छद्म नाम से गुप्त रूप से जापान चले गए। जापान में उनका जीवन संघर्षपूर्ण लेकिन अत्यंत प्रभावशाली रहा:
- राजनीतिक शरण और नागरिकता: ब्रिटिश सरकार लगातार जापान पर उनके प्रत्यर्पण का दबाव बना रही थी। लेकिन जापान के पैन-एशियन (Pan-Asian) विचारकों और दक्षिणपंथी नेताओं ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की। बाद में उन्होंने एक जापानी महिला (तोशिको सोमा) से विवाह किया और 1923 में जापानी नागरिकता प्राप्त की।
- सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: उन्होंने जापानी भाषा सीखी, कई पुस्तकें लिखीं और वहां के समाचार पत्रों में भारत का पक्ष मजबूती से रखा।
- उन्होंने ही जापानियों को प्रामाणिक ‘भारतीय करी’ (Indian Curry) के स्वाद से परिचित कराया, जो आज भी वहां ‘नाकामुराया करी’ के नाम से प्रसिद्ध है।
इंडियन इंडिपेंडेंस लीग और आजाद हिंद फौज (INA):
द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थितियों को भांपते हुए रास बिहारी बोस ने भारत की स्वतंत्रता के लिए सैन्य प्रयास तेज कर दिए:
- इंडियन इंडिपेंडेंस लीग (IIL): मार्च 1942 में उन्होंने टोक्यो में एक सम्मेलन आयोजित कर ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य विदेशों में रह रहे भारतीयों को एकजुट करना था।
- आजाद हिंद फौज की स्थापना: 1942 में बैंकॉक सम्मेलन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश सेना से युद्धबंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों को मिलाकर आजाद हिंद फौज (Indian National Army) के गठन की आधिकारिक घोषणा की, जिसमें कैप्टन मोहन सिंह की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
- नेतृत्व का हस्तांतरण: खराब स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने इस आंदोलन को बिखरने नहीं दिया। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस 1943 में जापान पहुंचे, तो रास बिहारी बोस ने स्वेच्छा से ‘आजाद हिंद फौज’ और ‘इंडियन इंडिपेंडेंस लीग’ की कमान उनके हाथों में सौंप दी।
- नेताजी ने उन्हें ‘आजाद हिंद आंदोलन का पिता’ (Father of the Indian Independence Movement in East Asia) कहकर सम्मानित किया।
मृत्यु और सम्मान:
21 जनवरी 1945 को टोक्यो में इस महान क्रांतिकारी का निधन हो गया। उनके सर्वोच्च योगदान के लिए जापानी सरकार ने उन्हें अपने देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन’ (Order of the Rising Sun) से नवाजा था।