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स्मॉग-ईटिंग फोटोकैटेलिटिक कोटिंग तकनीक (Smog-eating photocatalytic coating technology) | Apni Pathshala

Smog-eating photocatalytic coating technology

Smog-eating photocatalytic coating technology

संदर्भ:

हाल ही में दिल्ली सरकार ने बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास के साथ एक रणनीतिक साझेदारी की है। जिसके तहत शहर के बुनियादी ढांचे पर “स्मोग-ईटिंग” फोटोकैटलिटिक कोटिंग का परीक्षण किया जा रहा है।

स्मॉग-ईटिंग फोटोकैटलिटिक कोटिंग क्या हैं?

  • परिचय: स्मॉग-ईटिंग कोटिंग एक उन्नत नैनो-तकनीक है जिसे शहरी बुनियादी ढांचे (सड़कों, फ्लाईओवरों और इमारतों) पर लगाकर हवा को साफ करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। 
  • मुख्य घटक: इस कोटिंग का मुख्य सक्रिय तत्व टाइटेनियम डाइऑक्साइड (TiO₂) है। यह एक ‘फोटोकैटलिस्ट’ (प्रकाश-उत्प्रेरक) के रूप में कार्य करता है। 
  • रासायनिक सूत्र (Copy-Friendly Formula): TiO₂ + UV Light + NOₓ → Nitrates + H₂O

यह कैसे काम करती है? 

  • सौर सक्रियण: जैसे ही सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणें कोटिंग वाली सतह पर पड़ती हैं, TiO₂ के इलेक्ट्रॉन उत्तेजित हो जाते हैं।
  • मुक्त कणों का निर्माण: यह उत्तेजना हवा की नमी (H₂O) और ऑक्सीजन (O₂) के साथ क्रिया करके ‘हाइड्रॉक्सिल रेडिकल्स’ (OH) और ‘सुपरऑक्साइड आयन’ पैदा करती है। ये कण बहुत शक्तिशाली सफाई एजेंट होते हैं।
  • प्रदूषकों का रूपांतरण: जब वाहन के धुएं से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) या जहरीले वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs) इस सतह के संपर्क में आते हैं, तो वे तुरंत ऑक्सीकृत हो जाते हैं।
  • अहानिकर अवशेष: यह प्रक्रिया जहरीली गैसों को अहानिकर नाइट्रेट्स (Nitrates) और पानी के सूक्ष्म कणों में बदल देती है, जो बाद में बारिश या धुलाई से साफ हो जाते हैं।

तकनीक के प्रमुख लाभ:

  • ऊर्जा की बचत: स्मॉग टावरों के विपरीत, इसमें पंखे या फिल्टर चलाने के लिए बिजली की जरूरत नहीं होती। यह 100% सौर ऊर्जा पर आधारित ‘पैसिव क्लीनिंग’ तकनीक है।
  • व्यापक कवरेज: इसे सड़कों की मार्किंग, कंक्रीट की दीवारों और फुटपाथों पर पेंट की तरह लगाया जा सकता है, जिससे पूरा शहर एक फिल्टर की तरह काम करने लगता है।
  • स्थायित्व: एक बार लगाने के बाद, यह कोटिंग कई महीनों तक सक्रिय रहती है क्योंकि टाइटेनियम डाइऑक्साइड प्रक्रिया में खत्म नहीं होता।
  • स्व-सफाई (Self-Cleaning): यह इमारतों पर गंदगी, फफूंद और काई को जमा होने से भी रोकती है, जिससे रखरखाव का खर्च कम होता है।

इसकी सीमाएँ:

  • धूल का जमाव: दिल्ली जैसे शहरों में जहां धूल (Dust) अधिक है, कोटिंग पर धूल की परत जमने से सूर्य की रोशनी TiO₂ तक नहीं पहुंच पाती। इसके लिए सतहों को नियमित पानी से धोना जरूरी होगा।
  • नाइट्रेट रन-ऑफ: बारिश के दौरान बहने वाले नाइट्रेट्स यदि भारी मात्रा में जल निकायों (जैसे यमुना) में जाते हैं, तो वे पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • सर्दियों का प्रभाव: दिल्ली की सर्दियों में अक्सर घना कोहरा होता है और धूप कम निकलती है, जिससे इस तकनीक की प्रभावशीलता कम हो सकती है।

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