विश्व की पहली EASyMelt तकनीक | World first EASyMelt technology

संदर्भ:
हाल ही में टाटा स्टील और जर्मनी के SMS ग्रुप ने जमशेदपुर प्लांट में दुनिया की पहली EASyMelt (Electrically Assisted Syngas Smelter) तकनीक को औद्योगिक स्तर पर प्रदर्शित करने के लिए साझेदारी की।
EASyMelt तकनीक क्या हैं?
EASyMelt का अर्थ है “Electrically Assisted Syngas Smelter”। यह एक हाइब्रिड लौह निर्माण तकनीक है जो मौजूदा ब्लास्ट फर्नेस में बिजली और सिनगैस (Syngas – H2 + CO) के उपयोग को एकीकृत करती है।
- यह तकनीक पारंपरिक कोयले/कोक आधारित प्रक्रिया को कम-कार्बन वाली गैसीय और विद्युत प्रक्रिया में बदल देती है।
- यह वर्तमान में वैश्विक इस्पात उद्योग में डीकार्बोनाइजेशन के लिए सबसे क्रांतिकारी समाधान मानी जा रही है।
- इस तकनीक का विकास SMS Group की सहायक कंपनी Paul Wurth S.A. (लक्समबर्ग) द्वारा किया गया है।
कार्य प्रणाली:
- सिनगैस उत्पादन और इंजेक्शन: फर्नेस की ऊपरी गैस (Top Gas) को रिसाइकिल किया जाता है और कोक ओवन गैस या प्राकृतिक गैस के साथ मिलाकर सिनगैस (hydrogen gas + CO) बनाई जाती है। इसे फर्नेस के ‘शाफ्ट’ (Shaft) और ‘टुयेर’ (Tuyere) स्तरों पर इंजेक्ट किया जाता है।
- प्लाज्मा टॉर्च सुपरहीटिंग: टुयेर स्तर पर इंजेक्ट की जाने वाली सिनगैस को प्लाज्मा टॉर्च (Plasma Torch) प्रणाली का उपयोग करके अत्यधिक उच्च तापमान (Superheating) तक गर्म किया जाता है। यह सीधे बिजली का उपयोग करके लौह अयस्क के पिघलने की प्रक्रिया को गति देता है।
- कोक की जगह लेना: सिनगैस एक रिड्यूसिंग एजेंट (Reducing Agent) के रूप में कार्य करती है, जिससे फर्नेस में कोक (Coke) की खपत न्यूनतम हो जाती है।
प्रमुख विशेषताएं:
- संसाधन लचीलापन (Resource Flexibility): यह प्राकृतिक गैस, हाइड्रोजन, अमोनिया, और बिजली जैसे विभिन्न ऊर्जा स्रोतों के उपयोग की अनुमति देती है।
- कच्चे माल की अनुकूलता: पारंपरिक डायरेक्ट रिडक्शन (DR) प्रक्रियाओं के विपरीत, यह निम्न-श्रेणी के लौह अयस्क (सिटर फीड) पर भी प्रभावी ढंग से काम करती है।
- ब्राउनफील्ड डीकार्बोनाइजेशन: इसे मौजूदा पुराने ब्लास्ट फर्नेस में रेट्रोफिट (Retrofit) किया जा सकता है, जिससे पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को बदलने की लागत बचती है।
- निम्न CAPEX: नई डायरेक्ट रिडक्शन प्लांट (DRP) लगाने की तुलना में इसमें निवेश और परिचालन लागत बहुत कम है।
महत्व:
- पर्यावरणीय प्रभाव: इस्पात क्षेत्र वैश्विक $CO_2$ उत्सर्जन में लगभग 7-8% का योगदान देता है। EASyMelt जैसी तकनीकें पेरिस समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण हैं।
- भारत के लिए प्रासंगिकता: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक है। भारतीय इस्पात क्षेत्र को स्वच्छ बनाने के लिए यह तकनीक एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है, क्योंकि यह मौजूदा संयंत्रों को बिना बंद किए हरित बनाने का मार्ग प्रशस्त करती है।
- तकनीकी संप्रभुता: दुनिया में पहली बार इस स्तर का प्रयोग भारत में होना वैश्विक स्तर पर भारत की तकनीकी स्वीकार्यता को बढ़ाता है।
- आर्थिक स्थिरता: यह तकनीक ऊर्जा कीमतों और कच्चे माल की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव के प्रति उद्योग को अधिक लचीला (Resilient) बनाती है।