डांडेवाला फील्ड में नए प्राकृतिक गैस क्षेत्र की खोज

संदर्भ:
हाल ही में भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख ऊर्जा कंपनी ऑयल इंडिया लिमिटेड (OIL) ने राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित डांडेवाला फील्ड (Dandewala Field) में एक नए प्राकृतिक गैस क्षेत्र (Gas-Bearing Zone) की महत्वपूर्ण खोज की।
- केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, यह खोज देश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर है।
खोज के मुख्य तकनीकी आंकड़े:
- उत्पादक फॉर्मेशन: डांडेवाला गैस फील्ड में पहली बार अपेक्षाकृत कम गहराई पर स्थित ‘सानू फॉर्मेशन’ (Sanu Formation) से प्राकृतिक गैस का प्रवाह प्राप्त हुआ है।
- गहराई और क्षमता: यह खोज जमीन से लगभग 950 मीटर की गहराई पर की गई है, जहां परीक्षण के दौरान 25,000 मानक घन मीटर प्रतिदिन (SCMD) गैस का औसत प्रवाह दर्ज किया गया।
- अनुमानित भंडार: प्रारंभिक पेट्रोफिजिकल और उप-सतह विश्लेषण के आधार पर इस नए ज़ोन में 75 मिलियन मानक घन मीटर (MMSCM) ‘गैस-इन-प्लेस’ (Gas-In-Place) संसाधन होने का अनुमान लगाया गया है।
- गैस की गुणवत्ता: यह गैस पर्यावरण के अनुकूल है क्योंकि इसमें कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की मात्रा बेहद कम है, जिससे यह एक शुद्ध और स्वच्छ ईंधन विकल्प बनती है।
अन्वेषण रणनीति: “मिस-अपॉर्चुनिटी” दृष्टिकोण:
ऑयल इंडिया लिमिटेड ने इस सफलता को अपनी विशेष तकनीकी रणनीति का परिणाम बताया है। कंपनी ने “मिस-अपॉर्चुनिटी दृष्टिकोण” के तहत उन भूगर्भीय परतों और ब्लॉक का आधुनिक डेटा विश्लेषण और तकनीकी हस्तक्षेप के माध्यम से पुनर्मूल्यांकन किया, जिन्हें पहले कम क्षमता वाला मानकर छोड़ दिया गया था या जिनका पूरी तरह से अन्वेषण नहीं हुआ था।
डांडेवाला फील्ड और राजस्थान बेसिन की पृष्ठभूमि:
- ऐतिहासिक संदर्भ: डांडेवाला फील्ड की पहली खोज OIL द्वारा वर्ष 1991-92 में की गई थी, और यहाँ से व्यावसायिक उत्पादन वर्ष 1996 में शुरू हुआ था।
- जैसलमेर बेसिन का महत्व: पश्चिमी राजस्थान का जैसलमेर बेसिन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस भंडारों के लिए जाना जाता है। यहाँ डांडेवाला के अलावा तनोट, बागीटिब्बा, मनहेरा टिब्बा और घोटारू जैसे प्रमुख गैस क्षेत्र सक्रिय हैं।
- स्थानीय बिजली उत्पादन: वर्तमान में जैसलमेर के इन कुओं से उत्पादित होने वाली अधिकांश गैस को गेल इंडिया (GAIL India) की पाइपलाइन के माध्यम से रामगढ़ गैस थर्मल पावर स्टेशन (क्षमता लगभग 270.5 मेगावाट) भेजा जाता है। इस बिजली का उपयोग भारत-पाकिस्तान सीमा पर फ्लड लाइट्स और स्थानीय क्षेत्रों में किया जाता है।
रणनीतिक महत्व:
- ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85% से अधिक और प्राकृतिक गैस की खपत का लगभग 50% आयात करता है। पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक बाजार की अस्थिरता के बीच ऐसी घरेलू खोजें भारत की बाह्य झटकों के प्रति संवेदनशीलता को कम करती हैं।
- गैस-आधारित अर्थव्यवस्था का लक्ष्य: भारत सरकार ने देश के प्राथमिक ऊर्जा मिश्रण (Primary Energy Mix) में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को वर्तमान के लगभग 6.7% से बढ़ाकर 2030 तक 15% करने का लक्ष्य रखा है। डांडेवाला में सानू फॉर्मेशन की यह खोज इस लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होगी।
- पर्यावरण अनुकूल विकास: चूंकि इस गैस में कार्बन का घनत्व कम है, यह भारत को पंचामृत (COP26) के तहत वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य (Net-Zero) उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर बढ़ने में एक ‘ब्रीजिंग फ्यूल’ (Transitional Fuel) के रूप में मदद करेगी।
- क्षेत्रीय विकास और निवेश: इस खोज से पश्चिमी राजस्थान में नए औद्योगिक क्लस्टर्स का विकास होगा, बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ेगा और स्थानीय रोजगार के नए अवसरों का सृजन होगा।