Sarhul Festival
संदर्भ:
हाल ही में 21 मार्च 2026 को सरहुल महोत्सव मनाया गया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संदेश दिया कि यह पर्व हमारी सामूहिक चेतना और प्रकृति के प्रति गहरे लगाव का प्रतीक है।
सरहुल महोत्सव (Sarhul Festival) के बारे में:
- परिचय: यह महोत्सव झारखंड और छोटानागपुर क्षेत्र की आदिवासी जनजातियों द्वारा मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रकृति पर्व है। यह पर्व वसंत ऋतु के आगमन और नए साल का प्रतीक है।
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- व्युत्पत्ति: ‘सरहुल’ शब्द ‘सर’ (सरई – साल के बीज) और ‘हुल’ (पूजा) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है ‘साल वृक्ष की पूजा’।
- संबंधित जनजातियाँ: इसे मुख्य रूप से मुंडा, उरांव, हो, संताल और खड़िया जनजातियों द्वारा मनाया जाता है। इसे विभिन्न नामों से जाना जाता है:
- उरांव: खड्डी (Khaddi)
- मुंडा और हो: बा परब (Ba Parab)
- संताल: बाहा परब (Baha Parab)
- प्रतीकवाद: यह पर्व सूर्य (भगवान) और धरती माता के मिलन का प्रतीक है, जो जीवन के चक्र को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
- परंपराएँ: सरहुल एक तीन दिवसीय उत्सव है जो चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को शुरू होता हैं:
- पाहन की भूमिका: गांव के पुजारी (पाहन) उपवास रखते है और ‘सरना स्थल’ (पवित्र उपवन) में पूजा करते है।
- साल वृक्ष की प्रधानता: साल के फूलों (सखुआ) को ग्राम देवी ‘सरना माँ’ को अर्पित किया जाता है। ग्रामीण इन फूलों को आशीर्वाद के रूप में अपने घरों की छतों पर रखते हैं, जिसे ‘फूल कांसी’ कहा जाता है।
- भविष्यवाणी: अनुष्ठान के दौरान, पाहन पानी से भरे मिट्टी के बर्तनों का निरीक्षण करता है। यदि पानी का स्तर बना रहता है, तो अच्छी वर्षा और फसल की भविष्यवाणी की जाती है।
- प्रतिबंध: उत्सव के दौरान हल चलाना या मिट्टी खोदना वर्जित है; नए कृषि कार्य पूजा के बाद ही शुरू किए जाते हैं।
साल वृक्ष के बारे में:
वानस्पतिक विशेषताएँ:
महत्व:
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